Sunday, 16 May 2021

कोरोना काल में आंकड़े किस तरफ हैं?

Which side are the figures in the Corona era?



आंकड़े...ओ आंकड़े !

तुम किसकी तरफ हो?

इसकी तरफ हो या उसकी तरफ हो?

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भैया जी ! ना में इसकी तरफ हूं

ना उसकी तरफ हूं

बंदा जैसा पढ़ ले

मैं उसकी तरफ हूं।

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क्या मतलब है तुम्हारा?

साफ-साफ बोलो

दोनों तरफ कैसे हो

इसका राज खोलो।

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भैया जी ! संख्या और प्रतिशत

मेरी दो फ्री होम डिलीवरी हैं

जिसको जो भा जाए

वो उसकी सेवा लेता है

और मुझे अपनी तरफ कर लेता है।

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अब देखो, माना टीके लगे 17 करोड़

दुनिया में सबसे ज्यादा

इतने कि कई देशों का पूर्ण टीकाकरण हो जाता

पर कुल आबादी पर प्रतिशत देखो

तो बहुत ही कम, निचला स्तर छू जाता

अब जो लेता संख्या की सेवा

आंकड़ा देता उसको मेवा

और जो थामे प्रतिशत का हाथ

देना पड़ता है उसका भी साथ।

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अब मौतें देखो ढाई लाख

है ना संख्या हाहाकारी

लेकिन प्रतिशत में पुकारो

तो मात्र एक-दो परसेंट

यानी जैसे फिजूल की हो महामारी।

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अब तुम्ही बताओ मैं किस तरफ?

इसकी तरफ या उसकी तरफ?

जो जैसा अपना ले, मैं उसी तरफ।

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लेकिन भैया जी, यदि तुम सब इतने सारे ना होते

तो मैं भारत की तरफ होता

चलो इतने सारे हो भी गए पर

यदि तुममें से बहुत सारे भ्रष्टाचारी, लुटेरे, नरभक्षी न होते

तो मैं भारत की तरफ होता

यदि तुम सब संकट में एक-दूसरे पर कीचड़ न उछालते

तो मैं भारत की तरफ होता

यदि तुम इंसानियत का दामन न छोड़ते

तो मैं भारत की तरफ होता।

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- लव कुमार सिंह


Saturday, 15 May 2021

कोरोना हास्य-व्यंग्य : आपकी इम्युनिटी बढ़ाने के लिए

Corona Humor To Increase Your Immunity


Read this, there will definitely be a slight increase in immunity


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प्रश्न– क्या कोविशील्ड लगे लड़के का विवाह कोवैक्सीन लगी लड़की से हो सकता है?

उत्तर– अरे गोत्र अलग–अलग होने से ये तो बहुत ही उत्तम विवाह होगा। विवाह से होने वाली संतान कोरोना के सभी वैरिएंट से लड़ने में समर्थ होगी।

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हमारी एक भौजी 45 से ऊपर के आयु वर्ग में वैक्सीन लगवाने गईं। गजब देखिए कि उन्हें कुछ ही मिनट के अंतर पर वैक्सीन की दो डोज लग गईं। एक डोज तो उन्हें कोविशील्ड की लगी। यह उनकी दूसरी डोज थी। इस डोज के लगने से कुछ ही क्षण पहले उन्हें वैक्सीन की पहली डोज मिली। दरअसल लाइन में भौजी से पीछे खड़ी एक महिला ने उनसे पूछा कि....

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“क्या आप 45 की हो गईं? देखने में तो बिल्कुल नहीं लगतीं।”

इस पहली डोज की इम्युनिटी इतनी जोरदार है कि भौजी एक महीने बाद भी चहकी हुई फिर रही हैं।

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हम सबका स्टाइल....

अपना सैनेटाइजर हो तो पुच्च...

और दूसरे का हो तो पुच्च, पुच्च, पुच्च, पुच्च...

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कोई गलती से भी मत बोलना कि भगवान मुझे उठा लो...आजकल फाइल तुरंत पास हो रही है।

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इम्युनिटी तो खाने-पीने से आ जाएगी, लेकिन ये ह्यूमेनिटी क्या खाकर पैदा की जाएगी?

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गाय भले ही अपने मालिक से नाराज हो…लेकिन रूठकर कभी कसाई के घर नहीं जाती..! इसलिए हम मोदी जी के साथ ही हैं। (गजेंद्र चौहान, टीवी की महाभारत वाले युधिष्ठिर)

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निकाल तो देते तुम्हें दिल से मुरसिद मगर सरकार कहती है कि जो जहां है वहीं रहे।

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एक जरूरी विज्ञापन- "आवश्यकता है दुकान के लिए एक लड़के की जो पुलिस को आता देखकर फटाफट शटर गिरा सके।"

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ग्राहक दुकान पर पहुंचा तो दुकान का शटर गिरा हुआ था। बाहर एक नंबर लिखा था और साथ में लिखा था- ऑनलाइन डिलीवरी वाले इस नंबर पर फोन करें। ग्राहक ने नंबर मिलाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई- “जल्दी से अपने सामने वाला शटर उठाओ और दुकान के अंदर आ जाओ।”

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अस्पताल वाले भी अजब हैं। पहले तो आदमी को लेते नहीं है और लेते हैं तो फिर वापस नहीं देते।

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मेरी इम्युनिटी कितनी अच्छी है यह मुझे इस बात से पता चला कि मैं कोरोना काल में रिलीज सलमान खान की फिल्म ‘राधे’ पूरी एक बार में ही देखने में सफल रहा।

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सैनेटाइजर और साबुन से हाथ धोते-धोते ‘पैसे वाली लकीर’ मिटती दिख रही है। ...और अगर ना धोएं तो ‘उम्र वाली लकीर’ मिटती दिखती है। भरे बाजार देखता हूं तो लगता है दुनिया में कोरोना आया ही नहीं और न्यूज चैनल देखता हूं तो लगता है कि अब कोई जिंदा बचेगा ही नहीं।

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सिर्फ बातों से कोई कहां सीखा है,

सबको सीखने के लिए एक 'हादसा' चाहिए।

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प्रस्तुति- लव कुमार सिंह

Tuesday, 11 May 2021

कोरोना : बिना खर्चे वाला सिर्फ एक छोटा सा कदम उठाइए और लाभ पाइए

Corona : Take only one small step without spending and get profit



मुख्य डॉक्टर साहब/जिलाधिकारी साहब/सरकार साहब!

बिना खर्चे वाला सिर्फ एक छोटा सा कदम उठाइए और लाभ पाइए

क्या लाभ होगा?

  • आप तीनों साहिबान की टेंशन कम होगी।
  • आपके जिले/प्रदेश में अफरातफरी कम होगी।
  • चीख-पुकार कम मचेगी, आरोप-प्रत्यारोप कम होंगे।
  • कोरोना पीड़ितों का हौसला बढ़ेगा।
  •  मरीज को बचाने के डॉक्टर के प्रयास ज्यादा सार्थक होंगे।
  •  डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की जवाबदेही बढ़ेगी।
  •  ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ेगी यानी मौतें कम होंगी।

कैसे?

  • आज कोरोना के मरीज को जितनी दवा चाहिए उतना ही हौसला चाहिए।
  • कोरोना के मरीज को अपने परिजनों का सहारा चाहिए।
  • मरीज के परिजन को अपने प्रिय की आवाज चाहिए, उसका चेहरा, शरीर चाहिए।
  • हौसले और हिम्मत के बिना दवा भी असर नहीं करती है।

तो क्या करें?

- जिन कोरोना मरीजों के परिजन उनकी देखभाल करने को तैयार हैं, उन्हें पीपीई किट आदि जरूरी सामान के साथ वार्ड में जाकर मरीजों की देखभाल करने दीजिए। वे अपने मरीजों को समय पर दवाएं, खाना, भाप आदि ज्यादा अच्छी तरह से दे सकेंगे।

- ऐसे परिजन अपने मरीजों का हौसला बढ़ा सकेंगे। परिजन को पास में पाकर मरीज का हौसला नहीं टूटेगा। उसे जल्दी ठीक होने की उम्मीद बंधेगी।

- यदि मरीज की हालत खराब भी हुई तो वह परिजन के सामने होगी। मौत भी हुई तो परिजन के सामने होगी। तब आज जैसे आरोपों में कमी आएगी। तब परिजन को इस बात का संतोष होगा कि चलो विधाता को जो मजूर था वो हुआ, पर जो हुआ उनके सामने हुआ।

- अगर आप परिजन को देखभाल की अनुमति नहीं दे सकते तो कम से कम दिन में एक बार तो उसे पीपीई किट आदि पहनकर मरीज से मिलने की अनुमति दें।

- रोजाना बारी-बारी से किसी मंत्री, विधायक, सांसद, जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी का हर जिले के अस्पताल के कोविड वार्ड में दौरा कराएं। ये जनप्रतिनिधि और अधिकारी मरीजों से बात करें, उनका हौसला बढ़ाएं और व्यवस्थाएं देखें।

कोविड वार्ड में जाने से मरीज के परिजन संक्रमित हो गए तो?

- यह खतरा तो अब भी है। मरीजों के परिजन कहां रहते हैं? वे कोविड वार्ड के बाहर ही दिन-रात भटकते रहते हैं। वहां, जहां पर मरीज आते-जाते रहते हैं।

- ..और तीसरी लहर के बारे में कहा जा रहा है कि उसमें बच्चे ज्यादा संक्रमित होंगे तो ऐसे में उनके माता-पिता में से किसी एक को कोविड वार्ड में रहने की अनुमति देनी होगी। ...तो क्या तब उनके संक्रमित होने का खतरा नहीं होगा।

- पहली और दूसरी लहर में भी छोटे बच्चों के कई ऐसे केस आए हैं जिनमें उनकी स्वस्थ माता या पिता उनके साथ कोविड वार्ड में रहे हैं। उन्हें बच्चे के साथ रहने की अनुमति दी गई।

(जानकार मित्रों, कुछ गलत लिख गया होऊं तो ठीक कर दीजिएगा, क्योंकि मैं कोई विशेषज्ञ तो हूं नहीं। बस एक विचार आया कि किसी परिजन की मौत से हमेशा ही भयंकर पीड़ा होती है, लेकिन मौत जब कोरोना से हो तो पीड़ा की कोई सीमा ही नहीं रहती। ...क्योंकि दस-पंद्रह दिन से मरीज की सूरत नहीं देखी होती और ऐसे में जब मौत की खबर आती है तो शव सीधा अस्पताल से श्मशान जाता है। ऐसे में दिल में जो हूक और दर्द उठता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। अंतिम समय पर कुछ कह लेते, कुछ सुन लेते, पार्थिव शरीर का कुछ सम्मान कर लेते...इतना संतोष भी कोरोना से हुई मौत को मंजूर नहीं है। मौत तो सभी की आएगी किसी न किसी दिन, लेकिन काश वो कोरोना काल में न आए।) 

- लव कुमार सिंह


Monday, 10 May 2021

मुंबई ने कैसे कोरोना पर कंट्रोल किया?

How did Mumbai control the corona?

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 चौथी कड़ी....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- समस्या का आंकलन, पूर्वानुमान और सिस्टम का निर्माण)
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क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि कोरोना के एपीसेंटर बने मुंबई में ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि वहां बीएमसी के कमिश्नर के पास अब जनता की कोई फोन कॉल नहीं आती। इकबाल सिंह चहल यही दावा करते हैं। चहल के अनुसार मई 2020 में जब वे बीएमसी के कमिश्नर बने तो मुख्यमंत्री ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया। चहल ने अपनी टीम से कहा कि यह वायरस यूं ही जाने वाला नहीं है, इसलिए हमें दो-तीन साल की लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए। ...और इसी के साथ उन्होंने सिस्टम बनाना शुरू कर दिया।

कुछ खास बातें....

  • मुंबई में 7 जंबो कोविड सेंटर काम कर रहे हैं और 4 काम करने को तैयार हैं। 11 जंबो कोविड सेंटरों के 15 हजार बेड में से 70 प्रतिशत पर ऑक्सीजन की व्यवस्था हो, ऐसी तैयारियां की जा रही हैं। जंबो सेंटर बनाने बनाने का फायदा यह है कि उन अस्पतालों पर दबाव बिल्कुल कम हो जाता है जहां पर गंभीर मरीज भर्ती हैं।

  • मुंबई पहला शहर बना जिसने लैब द्वारा कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट को सीधे मरीज को देने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध से पहले यह होता था कि लैब शाम के 7 बजे मरीज को पॉजिटिव होने की सूचना देते थे। इस खबर को सुनकर पैनिक फोन कॉल्स और बेड के लिए अफरातफरी शुरू हो जाती थी। एक हेल्पलाइन नंबर पर हजारों कॉल आती थीं। इससे सेंट्रल कंट्रोल रूम कोलेप्स हो जाता था। इसी के साथ एक सिंगल मरीज बेड की खोज में सैकड़ों अन्य लोगों को संक्रमित कर देता था।

  • सभी जंबो कोविड सेंटरों के लिए ऑक्जीजन जनरेशन प्लांट की व्यवस्था की जा रही है। यदि सभी व्यवस्थाएं सही रहीं तो 31 मई तक मुंबई शहर को 1 क्यूबिक मीटर ऑक्सीजन की भी बाहर से जरूरत नहीं होगी। अन्य स्रोतों से मुंबई की ऑक्सीजन की जरूरत 60 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। तब उसे राज्य सरकार से ऑक्सीजन की मांग नहीं करनी पड़ेगी।

  • चहल के अनुसार उनके मन में तीसरी लहर को लेकर कोई संदेह नहीं है। वे इसके लिए भी तैयारी कर रहे हैं। चार नए जंबो कोविड सेंटर इसीलिए बनाए जा रहे हैं।

  • छह महीने पहले कर्नाटक से चहल के बैचमेट ने उनसे जानकारी ली कि ये वार्ड वार रूम क्या होते हैं? कैसे काम करते हैं? कैसे एंबुलेंसों का संचालन होता है? आदि-आदि। अब यही सब चीजें बेंगलूरू में लागू की जा रही हैं।

  • कुछ महीने पहले तक दूसरे राज्यों और केंद्र के उनके कुलीग्स चहल को फोन करके पूछते थे कि केवल महाराष्ट्र में ही कोविड क्यों है और ऐसा पूछकर वे हंसते थे। तब चहल उनसे कहते थे कि सबका नंबर आने वाला है। ऐसे हंसने वाले अफसरों को चहल के मॉडल में दिलचस्पी नहीं थी और चहल ने भी उनसे अपना मॉडल साझा नहीं किया। लेकिन आज हर तरफ उनके मॉडल की ही चर्चा है।

  • चहल सारे देश में लॉकडाउन लगाने के पक्ष में नहीं हैं। वह कहते हैं कि लॉकडाउन का मामला राज्यों पर ही छोड़ देना चाहिए। डिसेंट्रलाइज्ड लॉकडाउन होना चाहिए। वर्तमान स्थिति में यही बेहतर विकल्प है।
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दोस्तो, पिछली चार पोस्टों में कोरोना के संबंध में जो चार कड़ियां मुंबई के बीएमसी कमिश्नर इकबाल सिंह चहल के बारे में लिखीं, उनका उद्देश्य यही बताना था कि जिनके पास अधिकार हैं, जिम्मेदारियां हैं, यदि वे उन्हें सही तरीके से निभाएं तो किसी भी समस्या से लड़ा जा सकता है। यहां किसी अधिकारी को झाड़ पर चढ़ाने का उद्देश्य नहीं है। बस चहल का इंटरव्यू पढ़ा तो लगा कि इस बात को अन्य लोगों के साथ भी साझा करना चाहिए। हकीकत यह भी है कि केवल एक व्यक्ति से कुछ नहीं होने वाला है। ये केवल मुंबई की कहानी थी, जबकि बाकी महाराष्ट्र में हालात अभी सुधरे नहीं हैं। हमें देश के हर जिले में चहल जैसे अधिकारियों की जरूरत है। चुनौतियां बड़ी हैं। हो सकता है कि आने वाले मानसून सीजन में मुंबई की तैयारियां धरी की धरी रह जाएं, लेकिन वे कम से कम तीसरी लहर और मानसून को ध्यान में रखकर तैयारी तो कर रहे हैं। ऐसे ही कई जिलाधिकारियों की खबरें आई हैं कि कैसे उन्होंने खतरे को भांपकर पहले से ही तैयारी की और ऑक्सीजन के मामले में अपने जिलों को आत्मनिर्भर बना दिया। यह बात ठीक है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन अकेला चना इतनी तेज आवाज जरूर कर सकता है कि उसे सुनकर बाकी चने भी भाड़ को फोड़ने में जुट जाएं। क्या बाकी चने इसे सुन रहे हैं?

- लव कुमार सिंह

ऑक्सीजन की समस्या में अगर कोई आरोपित हो सकता है तो वो है राज्य सरकार

If anyone can be charged in the problem of oxygen, then it is the state government : BMC Commissioner Iqbal Singh Chahal

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तीसरी कड़ी.....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- ऑक्सीजन सप्लाई पर केंद्र और राज्यों की बीच रस्साकशी)
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इकबाल सिंह चहल का कहना है कि केंद्र और राज्यों के बीच रस्साकशी की कहानियों में कोई तथ्य नहीं है। ऑक्सीजन की सप्लाई पर ज्यादातर बातचीत अफसरों के स्तर पर ही होती है। इसलिए जब हम केंद्र सरकार में अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करते हैं तो वे हमारे बैचमेट की तरह होते हैं। एक बैच ऊपर या नीचे। हममे से किसी ने नहीं पाया कि भारत सरकार हमारी मदद करने की इच्छुक नहीं है। उनके सामने भी कई बार समस्याएं होती हैं। जैसे हम सीख रहे हैं, वैसे ही वे भी सीख रहे हैं।

उदाहरण के लिए जब मैंने केंद्र में कैबिनेट सेक्रेटरी से ऑक्सीजन को एयरलिफ्ट करने को कहा तो उन्होंने कहा कि हम इस बारे में विचार कर रहे हैं लेकिन कई समस्याएं आ रही हैं। बाद में मैंने (चहल) ने महसूस किया कि आप पूरे भरे टैंकर को लिफ्ट नहीं कर सकते। ऐसे में टैंकर फट सकता है। चहल का दावा है कि उनके काम करने के दौरान केंद्र और राज्य के अफसरों के बीच किसी भी प्रकार के मतभेद सामने नहीं आए।

चहल का स्पष्ट कहना है कि ऑक्सीजन की सप्लाई के मामले में यदि किसी को आरोपित किया जा सकता है तो वो राज्य सरकारें हैं। उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया कि हम अपने आंकड़ों में बिल्कुल ईमानदार रहे। हमारे यहां 60 हजार नए पॉजिटिव केस प्रतिदिन आ रहे थे। उस समय पूरा देश हम पर हंस रहा था। अनेक राज्य इस बात को जानने के लिए राजी नहीं थे कि उनके यहां कितने केस आ रहे हैं। जब उनके यहां केसों का आंकड़ा ही कम था तो केंद्र उन्हें ऑक्सीजन का ज्यादा एलोकेशन कैसे करता? हमारे एक पड़ोसी राज्य में 6 हजार केस प्रतिदिन थे, जबकि हमारे यहां 60 हजार केस प्रतिदिन। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि यदि वे सही टेस्टिंग करते तो उनके यहां भी 60 हजार केस ही होते।

अब बताइए केंद्र उनके लिए हमारे बराबर ऑक्सीजन कैसे तय करता? तो यदि किसी राज्य में एक हजार या दो हजार केस होंगे तो वहां के लिए ऑक्सीजन का कोटा भी कम होगा। यदि कोटा कम होगा तो लोगों को भारी समस्या होगी। क्योंकि उनके यहां कागज पर भले ही केस कम हों, लेकिन जमीन पर तो अफरातफरी मची है। हमारे मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही मुझसे कहा कि यदि मौतें हो रही हैं तो उनकी रिपोर्ट करने में बिल्कुल न हिचकिचाएं।
जारी.....

- लव कुमार सिंह

कोरोना के खिलाफ सारे अधिकारी इस प्रकार से काम करें तो बहुत कम जनहानि होगी

If all officers work against Corona in this way, there will be very little loss of life

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दूसरी कड़ी...जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- अफसर बहुत कुछ कर सकते हैं, बस उनमें काम करने का जज्बा होना चाहिए।)



अप्रैल 2021 के मध्य में मुंबई में ऑक्सीजन की आपूर्ति और भविष्य की मांग का हिसाब-किताब लगाया ही जा रहा था कि 16-17 अप्रैल की रात इकबाल सिंह चहल के पास आए एक फोन ने उनके होश उड़ा दिए। 16-17 अप्रैल 2021 की रात मुंबई के छह अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई थी और इमरजेंसी ऑपरेशन वाले 168 मरीजों की जान अटक गई थी। यह चहल के करियर की सबसे मुश्किल रातों में से एक थी।

रात एक से सुबह पांच बजे के बीच 150 एंबुलेंस लगाकर मरीजों को जंबो कोविड सेंटरों में शिफ्ट किया गया जहां 3600 में से 850 बेड ऑक्सीजन वाले थे। इस अभियान को खत्म करने के तुरंत बाद चहल ने सुबह 7 बजे केंद्र और राज्य सरकार के सभी शीर्ष अधिकारियों को संदेश भेजे और कहा कि ऐसी रात फिर आ सकती है।

केंद्र सरकार महाराष्ट्र के लिए बंगाल के हल्दिया से ऑक्सीजन की व्यवस्था कर चुकी थी लेकिन वहां से ऑक्सीजन आने में अभी कई दिन लगने थे। चहल के मैसेज करने के 15-20 सेकेंड बाद ही चहल के पास केंद्र से कैबिनिट सेक्रेटरी राजीव गौबा का फोन आ गया। चहल ने गौबा को अपनी मुश्किल बताई। हल्दिया से गैस आने में अभी कई दिन थे। चहल ने कहा कि यदि मुंबई को 16 घंटे की दूरी पर स्थित गुजरात के जामनगर से 125 एमटी गैस की आपूर्ति हो जाए तो काम बन सकता है। गौबा ने कहा कि केवल एक शहर के लिए ऐसा एलोकेशन नहीं हो सकता।

चहल ने कहा कि आप पूरे महाराष्ट्र के लिए कर दीजिए। उस 125 एमटी को केवल मुंबई में लाने की जिम्मेदारी मेरी। केंद्र और राज्य के दो अधिकारियों की चपलता, निर्णय लेने की क्षमता और सूझबूझ से तुरंत काम हो गया। मुंबई के लिए गुजरात के जामनगर से 125 एमटी गैस की व्यवस्था उसी शाम से शुरू हो गई।

इस घटना के बाद राज्य सरकार ने भी इमरजेंसी व्यवस्थाएं कीं। टीमें बनाकर ऑक्सीजन की सप्लाई को संतोषजनक बनाया। हल्दिया से भी गैस आ गई। मुंबई में छह इमरजेंसी स्टॉक प्वाइंट बनाए गए। इनमें 50 एमटी ऑक्सीजन रखी जाती है। हर प्वाइंट 24 वार्डों को सेवा देता है। यदि ऑक्सीजन के लिए कोई एसओएस कॉल आती है तो इन प्वाइंट की मदद से तुरंत ऑक्सीजन मुहैया कराई जाती है।
जारी...
- लव कुमार सिंह

दिल्ली में ऑक्सीजन का संकट क्यों हुआ और मुंबई में क्यों नहीं?

Why was there an oxygen crisis in Delhi and not in Mumbai?


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पहली कड़ी....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- दिल्ली में ऑक्सीजन की किल्लत क्यों और मुंबई में क्यों नहीं? इससे यह भी पता चलता है कि हर जगह ऑक्सीजन की मारामारी क्यों हो रही है?)



हाई-फ्लो नेजल ऑक्सीजन देना ऑक्सीजनखोरी है

इकबाल सिंह चहल के अनुसार ऑक्सीजन प्रबंधन में पांच चीजों का ध्यान रखना है-
पहला
स्टॉक की उपलब्धता और सुनिश्चित आपूर्ति। जब टैंकर उत्पादन इकाई से निकलता है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह कहां जा रहा है और कौन टैंकर की कस्टडी लेगा। (दिल्ली सरकार के अधिकारी यह व्यवस्था नहीं कर पाए।)
दूसरा
दबाव बढ़ने पर अस्पतालों पर बेड बढ़ाने का दबाव मत बढ़ाइए, क्योंकि अस्पताल में लगे ऑक्सीजन टैंक की एक निश्चित क्षमता होती है और 24 घंटे में टैंकों को भरने की व्यवस्था हो पाती है। यह एक सबसे बड़ा कारण है जिससे इतनी ज्यादा एसओएस कॉल आती हैं। चहल ने दिल्ली के अधिकारियों के साथ बैठक में कहा कि यदि आप मुंबई की तरह बेड बढ़ाना चाहते हैं तो अस्पतालों पर दबाव मत बनाइए। इसके बजाय उच्च ऑक्सीजन क्षमता वाले जंबो कोविड सेंटर बनाइए। उनमें बेड बढ़ाइए। मुंबई में 9000 बेड वाले सात जंबो सेंटर बने हैं और चार जल्दी बनने जा रहे हैं। (दिल्ली में यही हुआ। अस्पतालों पर बेड बढ़ाने का दबाव बढ़ा, लेकिन ऑक्सीजन टैंक तो वहीं था। दिक्कत आई, मरीजों की जान गई और बड़े अस्पतालों ने कोर्ट की शरण ली।)
तीसरा
ऑक्सीजन की लीकेज एक समस्या है। इसलिए आपके पास इमरजेंसी स्टॉक होना चाहिए। मुंबई में ऐसे छह इमरजेंसी प्वाइंट बने हैं, जो अलग-अलग वार्डों में इमरजेंसी मांग को पूरा करते हैं। इन प्वाइंट पर 50 एमटी गैस हर समय रिजर्व रखी जाती है। (दिल्ली में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं दिखी)
चौथा
मुंबई में ऑक्सीजन खपत के वास्ते डॉक्टरों की शीर्ष टीम से डॉक्टरों के लिए प्रोटोकाल बनाया गया और मुंबई के सभी 176 अस्पतालों को दिया गया। इसमें कहा गया कि 94 के बाद सेचुरेशन प्वाइंट मैंटेन नहीं करना चाहिए। यानी 97-98 के सैचुरेशन की जरूरत नहीं है। कहने का अर्थ है कि अस्पतालों को ऑक्सीजन किफायती ढंग से खर्च करनी थी। जब ऑक्सीजन का लेवल 94 आ गया तो उन्हें देखना चाहिए कि कहीं गैस की बरबादी तो नहीं हो रही है।
पांचवां
हाई-फ्लो नेजल ऑक्सीजन देना एक प्रकार से शराबखोरी जैसा काम है। हम इसे ऑक्सीजनखोरी का नाम दे सकते हैं। यदि ऑक्सीजन उपलब्ध है तो यह हर किसी को आंख मूंदकर नहीं देनी चाहिए। यह अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल होनी चाहिए। अस्पतालों से कहा गया कि ऑक्सीजन की खपत का दैनिक ऑडिट करिए और इसकी खपत को 5 प्रतिशत तक कम करने का प्रयास करिए। दिल्ली सरकार ने चहल के साथ बातचीत में स्वीकारा किया कि सभी मरीजों को हाई-फ्लो नेजल ऑक्सीजन देना एक तरह से ऑक्सीजन की बर्बादी है। (दिल्ली में शुरू से ही ऑक्सीजन का ऑडिट हो जाता तो ऑक्सीजन की ऐसी मारामारी नहीं होती और अनेक लोगों की जान बच सकती थी।)

जारी......

प्रस्तुति- लव कुमार सिंह