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Tuesday, 25 May 2021

जब कोरोना नहीं था, तब भी गंगा घाट पर इसी प्रकार शव दफनाए जाते रहे हैं

Even when there was no corona, the bodies have been buried in the same way on the Ganges Ghat

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आप आज के मीडिया को कितना भी कोसिए, लेकिन मुझे आज के मीडिया की केवल और केवल एक बात बहुत अच्छी लगती है और वो यह कि झूठ कोई सा भी पक्ष बोले, दावा कोई सा भी खेमा करे, षड्यंत्र किसी की भी तरफ से हो, असली बात बहुत जल्द दुनिया के सामने आ जाती है। बेशक मीडिया खेमों में बंटा है, लेकिन इसका एक फायदा यह हुआ है कि झूठ ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। मीडिया का एक वर्ग कुछ दावा करता है तो दूसरा उस दावे की पड़ताल में जुट जाता है और यदि बात झूठी होती है तो तुरंत उसे तथ्यों के साथ परोस देता है। जब मीडिया कथित रूप से तटस्थ था, तब ऐसा अमूमन देखने को नहीं मिलता था।

हां, यह जरूर है कि इसके लिए आपको पाठक, दर्शक के रूप में थोड़ी मेहनत जरूर करनी होती है। आपको दोनों तरह के चैनल देखने होते हैं और दोनों तरह की वेबसाइट्स पर नजर पर नजर डालनी होती हैं। साथ ही अखबारों पर भी नजर बनाना जरूरी होता है।

अब देखिए ना, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गंगा के किनारे शवों को दफनाने के बड़े-बड़े फोटो छापे गए।  इस संबंध में क्या-क्या नहीं कहा गया, कैसी-कैसी गालियां दी गईं। लेकिन अब पता चल रहा है कि प्रयागराज में तो गंगा के किनारे के कुछ समाजों में शवों को इसी तरह दफनाने की बहुत परंपरा है। दैनिक जागरण में तो 2018 की एक तस्वीर भी आ गई है जो लगभग वैसी ही है, जैसी कोरोना के इस वर्तमान काल में दिखाई जा रही है। यानी जब कोरोना नहीं था, तब भी एक विशेष क्षेत्र में गंगा के किनारे का यही हाल था।

नीचे दैनिक जागरण की खबर का प्रयागराज से प्रकाशित एक खबर का चित्र है, जो सारी स्थिति को स्पष्ट कर रहा है।



प्रस्तुति- लव कुमार सिंह


#Media #Corona #FakeNews #Covid #Unite2fightCorona 

Sunday, 16 May 2021

कोरोना काल में आंकड़े किस तरफ हैं?

Which side are the figures in the Corona era?



आंकड़े...ओ आंकड़े !

तुम किसकी तरफ हो?

इसकी तरफ हो या उसकी तरफ हो?

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भैया जी ! ना में इसकी तरफ हूं

ना उसकी तरफ हूं

बंदा जैसा पढ़ ले

मैं उसकी तरफ हूं।

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क्या मतलब है तुम्हारा?

साफ-साफ बोलो

दोनों तरफ कैसे हो

इसका राज खोलो।

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भैया जी ! संख्या और प्रतिशत

मेरी दो फ्री होम डिलीवरी हैं

जिसको जो भा जाए

वो उसकी सेवा लेता है

और मुझे अपनी तरफ कर लेता है।

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अब देखो, माना टीके लगे 17 करोड़

दुनिया में सबसे ज्यादा

इतने कि कई देशों का पूर्ण टीकाकरण हो जाता

पर कुल आबादी पर प्रतिशत देखो

तो बहुत ही कम, निचला स्तर छू जाता

अब जो लेता संख्या की सेवा

आंकड़ा देता उसको मेवा

और जो थामे प्रतिशत का हाथ

देना पड़ता है उसका भी साथ।

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अब मौतें देखो ढाई लाख

है ना संख्या हाहाकारी

लेकिन प्रतिशत में पुकारो

तो मात्र एक-दो परसेंट

यानी जैसे फिजूल की हो महामारी।

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अब तुम्ही बताओ मैं किस तरफ?

इसकी तरफ या उसकी तरफ?

जो जैसा अपना ले, मैं उसी तरफ।

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लेकिन भैया जी, यदि तुम सब इतने सारे ना होते

तो मैं भारत की तरफ होता

चलो इतने सारे हो भी गए पर

यदि तुममें से बहुत सारे भ्रष्टाचारी, लुटेरे, नरभक्षी न होते

तो मैं भारत की तरफ होता

यदि तुम सब संकट में एक-दूसरे पर कीचड़ न उछालते

तो मैं भारत की तरफ होता

यदि तुम इंसानियत का दामन न छोड़ते

तो मैं भारत की तरफ होता।

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- लव कुमार सिंह


Tuesday, 11 May 2021

कोरोना : बिना खर्चे वाला सिर्फ एक छोटा सा कदम उठाइए और लाभ पाइए

Corona : Take only one small step without spending and get profit



मुख्य डॉक्टर साहब/जिलाधिकारी साहब/सरकार साहब!

बिना खर्चे वाला सिर्फ एक छोटा सा कदम उठाइए और लाभ पाइए

क्या लाभ होगा?

  • आप तीनों साहिबान की टेंशन कम होगी।
  • आपके जिले/प्रदेश में अफरातफरी कम होगी।
  • चीख-पुकार कम मचेगी, आरोप-प्रत्यारोप कम होंगे।
  • कोरोना पीड़ितों का हौसला बढ़ेगा।
  •  मरीज को बचाने के डॉक्टर के प्रयास ज्यादा सार्थक होंगे।
  •  डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की जवाबदेही बढ़ेगी।
  •  ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ेगी यानी मौतें कम होंगी।

कैसे?

  • आज कोरोना के मरीज को जितनी दवा चाहिए उतना ही हौसला चाहिए।
  • कोरोना के मरीज को अपने परिजनों का सहारा चाहिए।
  • मरीज के परिजन को अपने प्रिय की आवाज चाहिए, उसका चेहरा, शरीर चाहिए।
  • हौसले और हिम्मत के बिना दवा भी असर नहीं करती है।

तो क्या करें?

- जिन कोरोना मरीजों के परिजन उनकी देखभाल करने को तैयार हैं, उन्हें पीपीई किट आदि जरूरी सामान के साथ वार्ड में जाकर मरीजों की देखभाल करने दीजिए। वे अपने मरीजों को समय पर दवाएं, खानाभाप आदि ज्यादा अच्छी तरह से दे सकेंगे।

- ऐसे परिजन अपने मरीजों का हौसला बढ़ा सकेंगे। परिजन को पास में पाकर मरीज का हौसला नहीं टूटेगा। उसे जल्दी ठीक होने की उम्मीद बंधेगी।

- यदि मरीज की हालत खराब भी हुई तो वह परिजन के सामने होगी। मौत भी हुई तो परिजन के सामने होगी। तब आज जैसे आरोपों में कमी आएगी। तब परिजन को इस बात का संतोष होगा कि चलो विधाता को जो मजूर था वो हुआ, पर जो हुआ उनके सामने हुआ।

- अगर आप परिजन को देखभाल की अनुमति नहीं दे सकते तो कम से कम दिन में एक बार तो उसे पीपीई किट आदि पहनकर मरीज से मिलने की अनुमति दें।

- रोजाना बारी-बारी से किसी मंत्री, विधायक, सांसद, जिलाधिकारी, पुलिस अधिकारी का हर जिले के अस्पताल के कोविड वार्ड में दौरा कराएं। ये जनप्रतिनिधि और अधिकारी मरीजों से बात करें, उनका हौसला बढ़ाएं और व्यवस्थाएं देखें।

कोविड वार्ड में जाने से मरीज के परिजन संक्रमित हो गए तो?

- यह खतरा तो अब भी है। मरीजों के परिजन कहां रहते हैं? वे कोविड वार्ड के बाहर ही दिन-रात भटकते रहते हैं। वहां, जहां पर मरीज आते-जाते रहते हैं।

- ..और तीसरी लहर के बारे में कहा जा रहा है कि उसमें बच्चे ज्यादा संक्रमित होंगे तो ऐसे में उनके माता-पिता में से किसी एक को कोविड वार्ड में रहने की अनुमति देनी होगी। ...तो क्या तब उनके संक्रमित होने का खतरा नहीं होगा।

- पहली और दूसरी लहर में भी छोटे बच्चों के कई ऐसे केस आए हैं जिनमें उनकी स्वस्थ माता या पिता उनके साथ कोविड वार्ड में रहे हैं। उन्हें बच्चे के साथ रहने की अनुमति दी गई।

(जानकार मित्रों, कुछ गलत लिख गया होऊं तो ठीक कर दीजिएगा, क्योंकि मैं कोई विशेषज्ञ तो हूं नहीं। बस एक विचार आया कि किसी परिजन की मौत से हमेशा ही भयंकर पीड़ा होती है, लेकिन मौत जब कोरोना से हो तो पीड़ा की कोई सीमा ही नहीं रहती। ...क्योंकि दस-पंद्रह दिन से मरीज की सूरत नहीं देखी होती और ऐसे में जब मौत की खबर आती है तो शव सीधा अस्पताल से श्मशान जाता है। ऐसे में दिल में जो हूक और दर्द उठता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। अंतिम समय पर कुछ कह लेते, कुछ सुन लेते, पार्थिव शरीर का कुछ सम्मान कर लेते...इतना संतोष भी कोरोना से हुई मौत को मंजूर नहीं है। मौत तो सभी की आएगी किसी न किसी दिन, लेकिन काश वो कोरोना काल में न आए।) 

- लव कुमार सिंह


Monday, 10 May 2021

मुंबई ने कैसे कोरोना पर कंट्रोल किया?

How did Mumbai control the corona?

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 चौथी कड़ी....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- समस्या का आंकलन, पूर्वानुमान और सिस्टम का निर्माण)
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क्या हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि कोरोना के एपीसेंटर बने मुंबई में ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि वहां बीएमसी के कमिश्नर के पास अब जनता की कोई फोन कॉल नहीं आती। इकबाल सिंह चहल यही दावा करते हैं। चहल के अनुसार मई 2020 में जब वे बीएमसी के कमिश्नर बने तो मुख्यमंत्री ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया। चहल ने अपनी टीम से कहा कि यह वायरस यूं ही जाने वाला नहीं है, इसलिए हमें दो-तीन साल की लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए। ...और इसी के साथ उन्होंने सिस्टम बनाना शुरू कर दिया।

कुछ खास बातें....

  • मुंबई में 7 जंबो कोविड सेंटर काम कर रहे हैं और 4 काम करने को तैयार हैं। 11 जंबो कोविड सेंटरों के 15 हजार बेड में से 70 प्रतिशत पर ऑक्सीजन की व्यवस्था हो, ऐसी तैयारियां की जा रही हैं। जंबो सेंटर बनाने बनाने का फायदा यह है कि उन अस्पतालों पर दबाव बिल्कुल कम हो जाता है जहां पर गंभीर मरीज भर्ती हैं।

  • मुंबई पहला शहर बना जिसने लैब द्वारा कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट को सीधे मरीज को देने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध से पहले यह होता था कि लैब शाम के 7 बजे मरीज को पॉजिटिव होने की सूचना देते थे। इस खबर को सुनकर पैनिक फोन कॉल्स और बेड के लिए अफरातफरी शुरू हो जाती थी। एक हेल्पलाइन नंबर पर हजारों कॉल आती थीं। इससे सेंट्रल कंट्रोल रूम कोलेप्स हो जाता था। इसी के साथ एक सिंगल मरीज बेड की खोज में सैकड़ों अन्य लोगों को संक्रमित कर देता था।

  • सभी जंबो कोविड सेंटरों के लिए ऑक्जीजन जनरेशन प्लांट की व्यवस्था की जा रही है। यदि सभी व्यवस्थाएं सही रहीं तो 31 मई तक मुंबई शहर को 1 क्यूबिक मीटर ऑक्सीजन की भी बाहर से जरूरत नहीं होगी। अन्य स्रोतों से मुंबई की ऑक्सीजन की जरूरत 60 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। तब उसे राज्य सरकार से ऑक्सीजन की मांग नहीं करनी पड़ेगी।

  • चहल के अनुसार उनके मन में तीसरी लहर को लेकर कोई संदेह नहीं है। वे इसके लिए भी तैयारी कर रहे हैं। चार नए जंबो कोविड सेंटर इसीलिए बनाए जा रहे हैं।

  • छह महीने पहले कर्नाटक से चहल के बैचमेट ने उनसे जानकारी ली कि ये वार्ड वार रूम क्या होते हैं? कैसे काम करते हैं? कैसे एंबुलेंसों का संचालन होता है? आदि-आदि। अब यही सब चीजें बेंगलूरू में लागू की जा रही हैं।

  • कुछ महीने पहले तक दूसरे राज्यों और केंद्र के उनके कुलीग्स चहल को फोन करके पूछते थे कि केवल महाराष्ट्र में ही कोविड क्यों है और ऐसा पूछकर वे हंसते थे। तब चहल उनसे कहते थे कि सबका नंबर आने वाला है। ऐसे हंसने वाले अफसरों को चहल के मॉडल में दिलचस्पी नहीं थी और चहल ने भी उनसे अपना मॉडल साझा नहीं किया। लेकिन आज हर तरफ उनके मॉडल की ही चर्चा है।

  • चहल सारे देश में लॉकडाउन लगाने के पक्ष में नहीं हैं। वह कहते हैं कि लॉकडाउन का मामला राज्यों पर ही छोड़ देना चाहिए। डिसेंट्रलाइज्ड लॉकडाउन होना चाहिए। वर्तमान स्थिति में यही बेहतर विकल्प है।
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दोस्तो, पिछली चार पोस्टों में कोरोना के संबंध में जो चार कड़ियां मुंबई के बीएमसी कमिश्नर इकबाल सिंह चहल के बारे में लिखीं, उनका उद्देश्य यही बताना था कि जिनके पास अधिकार हैं, जिम्मेदारियां हैं, यदि वे उन्हें सही तरीके से निभाएं तो किसी भी समस्या से लड़ा जा सकता है। यहां किसी अधिकारी को झाड़ पर चढ़ाने का उद्देश्य नहीं है। बस चहल का इंटरव्यू पढ़ा तो लगा कि इस बात को अन्य लोगों के साथ भी साझा करना चाहिए। हकीकत यह भी है कि केवल एक व्यक्ति से कुछ नहीं होने वाला है। ये केवल मुंबई की कहानी थी, जबकि बाकी महाराष्ट्र में हालात अभी सुधरे नहीं हैं। हमें देश के हर जिले में चहल जैसे अधिकारियों की जरूरत है। चुनौतियां बड़ी हैं। हो सकता है कि आने वाले मानसून सीजन में मुंबई की तैयारियां धरी की धरी रह जाएं, लेकिन वे कम से कम तीसरी लहर और मानसून को ध्यान में रखकर तैयारी तो कर रहे हैं। ऐसे ही कई जिलाधिकारियों की खबरें आई हैं कि कैसे उन्होंने खतरे को भांपकर पहले से ही तैयारी की और ऑक्सीजन के मामले में अपने जिलों को आत्मनिर्भर बना दिया। यह बात ठीक है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन अकेला चना इतनी तेज आवाज जरूर कर सकता है कि उसे सुनकर बाकी चने भी भाड़ को फोड़ने में जुट जाएं। क्या बाकी चने इसे सुन रहे हैं?

- लव कुमार सिंह

कोरोना के खिलाफ सारे अधिकारी इस प्रकार से काम करें तो बहुत कम जनहानि होगी

If all officers work against Corona in this way, there will be very little loss of life

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दूसरी कड़ी...जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- अफसर बहुत कुछ कर सकते हैं, बस उनमें काम करने का जज्बा होना चाहिए।)



अप्रैल 2021 के मध्य में मुंबई में ऑक्सीजन की आपूर्ति और भविष्य की मांग का हिसाब-किताब लगाया ही जा रहा था कि 16-17 अप्रैल की रात इकबाल सिंह चहल के पास आए एक फोन ने उनके होश उड़ा दिए। 16-17 अप्रैल 2021 की रात मुंबई के छह अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई थी और इमरजेंसी ऑपरेशन वाले 168 मरीजों की जान अटक गई थी। यह चहल के करियर की सबसे मुश्किल रातों में से एक थी।

रात एक से सुबह पांच बजे के बीच 150 एंबुलेंस लगाकर मरीजों को जंबो कोविड सेंटरों में शिफ्ट किया गया जहां 3600 में से 850 बेड ऑक्सीजन वाले थे। इस अभियान को खत्म करने के तुरंत बाद चहल ने सुबह 7 बजे केंद्र और राज्य सरकार के सभी शीर्ष अधिकारियों को संदेश भेजे और कहा कि ऐसी रात फिर आ सकती है।

केंद्र सरकार महाराष्ट्र के लिए बंगाल के हल्दिया से ऑक्सीजन की व्यवस्था कर चुकी थी लेकिन वहां से ऑक्सीजन आने में अभी कई दिन लगने थे। चहल के मैसेज करने के 15-20 सेकेंड बाद ही चहल के पास केंद्र से कैबिनिट सेक्रेटरी राजीव गौबा का फोन आ गया। चहल ने गौबा को अपनी मुश्किल बताई। हल्दिया से गैस आने में अभी कई दिन थे। चहल ने कहा कि यदि मुंबई को 16 घंटे की दूरी पर स्थित गुजरात के जामनगर से 125 एमटी गैस की आपूर्ति हो जाए तो काम बन सकता है। गौबा ने कहा कि केवल एक शहर के लिए ऐसा एलोकेशन नहीं हो सकता।

चहल ने कहा कि आप पूरे महाराष्ट्र के लिए कर दीजिए। उस 125 एमटी को केवल मुंबई में लाने की जिम्मेदारी मेरी। केंद्र और राज्य के दो अधिकारियों की चपलता, निर्णय लेने की क्षमता और सूझबूझ से तुरंत काम हो गया। मुंबई के लिए गुजरात के जामनगर से 125 एमटी गैस की व्यवस्था उसी शाम से शुरू हो गई।

इस घटना के बाद राज्य सरकार ने भी इमरजेंसी व्यवस्थाएं कीं। टीमें बनाकर ऑक्सीजन की सप्लाई को संतोषजनक बनाया। हल्दिया से भी गैस आ गई। मुंबई में छह इमरजेंसी स्टॉक प्वाइंट बनाए गए। इनमें 50 एमटी ऑक्सीजन रखी जाती है। हर प्वाइंट 24 वार्डों को सेवा देता है। यदि ऑक्सीजन के लिए कोई एसओएस कॉल आती है तो इन प्वाइंट की मदद से तुरंत ऑक्सीजन मुहैया कराई जाती है।
जारी...
- लव कुमार सिंह

Saturday, 27 February 2021

कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन कैसे करें?

How to register to get Corona vaccine?



स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्करों को कोरोना की वैक्सीन लगाने के बाद अब सरकार ने अन्य लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनके अनुसार यदि आपकी आयु 60 वर्ष या इससे ज्यादा है या यदि आपकी आयु 45 वर्ष से 59 वर्ष के बीच में है और आपको कोई गंभीर बीमारी है तो आप कोरोना वैक्सीन का टीका लगवाने के योग्य हैं। लेकिन कोरोना का टीका लगवाने के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी है।

रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया तीन तरह से की जा सकती है।

  • एडवांस सेल्फ रजिस्ट्रेशन,
  • ऑन-साइट रजिस्ट्रेशन और
  • फेसिलेटिड कोहोर्ट रजिस्ट्रेशन। 

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एडवांस सेल्फ रजिस्ट्रेशन


इसके लिए एक ऐप है। जिसका नाम है कोविन। Co-WIN 2.0 ऐप को डाउनलोड करके लोग खुद को एडवांस में सेल्फ रजिस्टर्ड कर सकते हैं। इसके अलावा अन्य ऐप्स जैसे Arogya Setu से भी रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। सेल्फ रजिस्ट्रेशन के बाद इस कार्य में जुड़े सरकारी और प्राइवेट हॉस्पिटल यूजर को दी गई तारीख और समय स्लॉट के साथ मिलेंगे। यूजर अपनी मर्जी के हिसाब से कोविड वैक्सीन सेंटर (CVC) का चुनाव कर सकते हैं और वैक्सीन के लिए समय का चुनाव कर सकते हैं।


ऑन साइट रजिस्ट्रेशन


जो लोग खुद रजिस्ट्रेशन नहीं कर सकते हैं तो उनके लिए ऑन साइट रजिस्ट्रेशन का ऑप्शन भी दिया गया है। इसमें यूजर खुद देखे गए कोविड वैक्सीन सेंटर में जाकर वैक्सीन लगवा सकते हैं।


अन्य विकल्प


अन्य विकल्प के तौर पर राज्य सरकारें लोगों के बड़े ग्रुप को वैक्सीन लगवाने के लिए बल्क स्लॉट रजिस्टर्ड कर सकती हैं और उसके बाद उन्हें वैक्सीन सेंटर लाकर वैक्सीन लगवा सकती हैं। कोरोनावायरस वैक्सीनेशन के लिए एक तारीख तय की जाएगी और उस दिन तय लोगों को लाकर टीका लगवाएगी। राज्य और स्वास्थ्य अधिकारी तय करेंगे कि तय लोगों को कैसे वैक्सीननेशन सेंटर पर लाया जाए। आशा, एएनएम,  पंचायती राज प्रतिनिधि और वुमेन सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHGs) लोगों को एकत्रित करने में मदद करेंगे।


जरूरी दस्तावेज


सभी लोगों को इस दौरान फोटो आईडी दस्तावेज जैसे कि आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड रखना होगा। ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए फोटो आईडी कार्ड जरूरी है। 45 वर्ष से 59 वर्ष की उम्र के लोगों के लिए बीमारी का सर्टिफिकेट जरूरी है। एम्लोयमेंट सर्टिफिकेट या ऑफिशियल आईडेंटिटी कार्ड भी काम आएगा।


वैक्सीन की फीस


सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन मुफ्त में लग रही है, जबकि टीकाकरण के लिए चुने गए सरकारी अस्पतालों में इसके लिए 250 रुपये देने होंगे। इसमें 150 रुपये वैक्सीन के हैं और 100 रुपये अस्पताल का चार्ज।


रजिस्ट्रेशन का तरीका


  • cowin.gov.in वेबसाइट या फिर Co-WIN ऐप पर जाएं।
  • यहां अपना मोबाइल नंबर या फिर आधार नंबर दर्ज करना होगा।
  • अब आपको एक ओटीपी मिलेगा, जिसके साथ आपका अकाउंट बन जाएगा।
  • इस अकाउंट पर परिवार के अन्य सदस्यों को भी रजिस्टर्ड किया जा सकता है।
  • एकाउंट बनने के बाद तारीख, सेंटर और समय भरने की प्रक्रिया पूरी करें।
  • इसके बाद तय तारीख और समय पर वैक्सीनेशन सेंटर पर पहुंचें और वहां अपनी रेफ्रेंस आईडी बताएं।
  • इस दौरान अगर आपकी 60 वर्ष या इससे ज्यादा की उम्र का प्रमाण पत्र दिखाना होगा। उम्र 45 वर्ष से अधिक है तो आपको अपनी बीमारी संबंधी प्रमाणपत्र दिखाना होगा।
- लव कुमार सिंह