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Tuesday, 25 May 2021

जब कोरोना नहीं था, तब भी गंगा घाट पर इसी प्रकार शव दफनाए जाते रहे हैं

Even when there was no corona, the bodies have been buried in the same way on the Ganges Ghat

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आप आज के मीडिया को कितना भी कोसिए, लेकिन मुझे आज के मीडिया की केवल और केवल एक बात बहुत अच्छी लगती है और वो यह कि झूठ कोई सा भी पक्ष बोले, दावा कोई सा भी खेमा करे, षड्यंत्र किसी की भी तरफ से हो, असली बात बहुत जल्द दुनिया के सामने आ जाती है। बेशक मीडिया खेमों में बंटा है, लेकिन इसका एक फायदा यह हुआ है कि झूठ ज्यादा देर तक टिक नहीं पाता। मीडिया का एक वर्ग कुछ दावा करता है तो दूसरा उस दावे की पड़ताल में जुट जाता है और यदि बात झूठी होती है तो तुरंत उसे तथ्यों के साथ परोस देता है। जब मीडिया कथित रूप से तटस्थ था, तब ऐसा अमूमन देखने को नहीं मिलता था।

हां, यह जरूर है कि इसके लिए आपको पाठक, दर्शक के रूप में थोड़ी मेहनत जरूर करनी होती है। आपको दोनों तरह के चैनल देखने होते हैं और दोनों तरह की वेबसाइट्स पर नजर पर नजर डालनी होती हैं। साथ ही अखबारों पर भी नजर बनाना जरूरी होता है।

अब देखिए ना, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में गंगा के किनारे शवों को दफनाने के बड़े-बड़े फोटो छापे गए।  इस संबंध में क्या-क्या नहीं कहा गया, कैसी-कैसी गालियां दी गईं। लेकिन अब पता चल रहा है कि प्रयागराज में तो गंगा के किनारे के कुछ समाजों में शवों को इसी तरह दफनाने की बहुत परंपरा है। दैनिक जागरण में तो 2018 की एक तस्वीर भी आ गई है जो लगभग वैसी ही है, जैसी कोरोना के इस वर्तमान काल में दिखाई जा रही है। यानी जब कोरोना नहीं था, तब भी एक विशेष क्षेत्र में गंगा के किनारे का यही हाल था।

नीचे दैनिक जागरण की खबर का प्रयागराज से प्रकाशित एक खबर का चित्र है, जो सारी स्थिति को स्पष्ट कर रहा है।



प्रस्तुति- लव कुमार सिंह


#Media #Corona #FakeNews #Covid #Unite2fightCorona 

Monday, 10 May 2021

ऑक्सीजन की समस्या में अगर कोई आरोपित हो सकता है तो वो है राज्य सरकार

If anyone can be charged in the problem of oxygen, then it is the state government : BMC Commissioner Iqbal Singh Chahal

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तीसरी कड़ी.....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- ऑक्सीजन सप्लाई पर केंद्र और राज्यों की बीच रस्साकशी)
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इकबाल सिंह चहल का कहना है कि केंद्र और राज्यों के बीच रस्साकशी की कहानियों में कोई तथ्य नहीं है। ऑक्सीजन की सप्लाई पर ज्यादातर बातचीत अफसरों के स्तर पर ही होती है। इसलिए जब हम केंद्र सरकार में अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करते हैं तो वे हमारे बैचमेट की तरह होते हैं। एक बैच ऊपर या नीचे। हममे से किसी ने नहीं पाया कि भारत सरकार हमारी मदद करने की इच्छुक नहीं है। उनके सामने भी कई बार समस्याएं होती हैं। जैसे हम सीख रहे हैं, वैसे ही वे भी सीख रहे हैं।

उदाहरण के लिए जब मैंने केंद्र में कैबिनेट सेक्रेटरी से ऑक्सीजन को एयरलिफ्ट करने को कहा तो उन्होंने कहा कि हम इस बारे में विचार कर रहे हैं लेकिन कई समस्याएं आ रही हैं। बाद में मैंने (चहल) ने महसूस किया कि आप पूरे भरे टैंकर को लिफ्ट नहीं कर सकते। ऐसे में टैंकर फट सकता है। चहल का दावा है कि उनके काम करने के दौरान केंद्र और राज्य के अफसरों के बीच किसी भी प्रकार के मतभेद सामने नहीं आए।

चहल का स्पष्ट कहना है कि ऑक्सीजन की सप्लाई के मामले में यदि किसी को आरोपित किया जा सकता है तो वो राज्य सरकारें हैं। उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया कि हम अपने आंकड़ों में बिल्कुल ईमानदार रहे। हमारे यहां 60 हजार नए पॉजिटिव केस प्रतिदिन आ रहे थे। उस समय पूरा देश हम पर हंस रहा था। अनेक राज्य इस बात को जानने के लिए राजी नहीं थे कि उनके यहां कितने केस आ रहे हैं। जब उनके यहां केसों का आंकड़ा ही कम था तो केंद्र उन्हें ऑक्सीजन का ज्यादा एलोकेशन कैसे करता? हमारे एक पड़ोसी राज्य में 6 हजार केस प्रतिदिन थे, जबकि हमारे यहां 60 हजार केस प्रतिदिन। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि यदि वे सही टेस्टिंग करते तो उनके यहां भी 60 हजार केस ही होते।

अब बताइए केंद्र उनके लिए हमारे बराबर ऑक्सीजन कैसे तय करता? तो यदि किसी राज्य में एक हजार या दो हजार केस होंगे तो वहां के लिए ऑक्सीजन का कोटा भी कम होगा। यदि कोटा कम होगा तो लोगों को भारी समस्या होगी। क्योंकि उनके यहां कागज पर भले ही केस कम हों, लेकिन जमीन पर तो अफरातफरी मची है। हमारे मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही मुझसे कहा कि यदि मौतें हो रही हैं तो उनकी रिपोर्ट करने में बिल्कुल न हिचकिचाएं।
जारी.....

- लव कुमार सिंह