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Monday, 10 May 2021

ऑक्सीजन की समस्या में अगर कोई आरोपित हो सकता है तो वो है राज्य सरकार

If anyone can be charged in the problem of oxygen, then it is the state government : BMC Commissioner Iqbal Singh Chahal

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तीसरी कड़ी.....जो सफल है, उसकी बात सुननी चाहिए

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कोरोना के खिलाफ जानदार लड़ाई का श्रेय मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल और उनकी टीम को दिया जा रहा है। हालांकि इस सफलता से पहले वे काफी समय तक पूरे देश के लिए हंसी का पात्र भी बने। लेकिन उन्होंने सीखा और काम किया। इसलिए हमें, नेताओं को, जिलों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को और डॉक्टरों को भी जानना चाहिए कि चहल और उनकी टीम ने यह काम कैसे किया और उनका मॉडल क्या है? यह सब चहल ने एक अंग्रेजी दैनिक के साथ बातचीत में कहा है। यहां कुछ कड़ियों में इस बातचीत का सार प्रस्तुत है... (इस कड़ी का विषय है- ऑक्सीजन सप्लाई पर केंद्र और राज्यों की बीच रस्साकशी)
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इकबाल सिंह चहल का कहना है कि केंद्र और राज्यों के बीच रस्साकशी की कहानियों में कोई तथ्य नहीं है। ऑक्सीजन की सप्लाई पर ज्यादातर बातचीत अफसरों के स्तर पर ही होती है। इसलिए जब हम केंद्र सरकार में अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करते हैं तो वे हमारे बैचमेट की तरह होते हैं। एक बैच ऊपर या नीचे। हममे से किसी ने नहीं पाया कि भारत सरकार हमारी मदद करने की इच्छुक नहीं है। उनके सामने भी कई बार समस्याएं होती हैं। जैसे हम सीख रहे हैं, वैसे ही वे भी सीख रहे हैं।

उदाहरण के लिए जब मैंने केंद्र में कैबिनेट सेक्रेटरी से ऑक्सीजन को एयरलिफ्ट करने को कहा तो उन्होंने कहा कि हम इस बारे में विचार कर रहे हैं लेकिन कई समस्याएं आ रही हैं। बाद में मैंने (चहल) ने महसूस किया कि आप पूरे भरे टैंकर को लिफ्ट नहीं कर सकते। ऐसे में टैंकर फट सकता है। चहल का दावा है कि उनके काम करने के दौरान केंद्र और राज्य के अफसरों के बीच किसी भी प्रकार के मतभेद सामने नहीं आए।

चहल का स्पष्ट कहना है कि ऑक्सीजन की सप्लाई के मामले में यदि किसी को आरोपित किया जा सकता है तो वो राज्य सरकारें हैं। उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण दिया कि हम अपने आंकड़ों में बिल्कुल ईमानदार रहे। हमारे यहां 60 हजार नए पॉजिटिव केस प्रतिदिन आ रहे थे। उस समय पूरा देश हम पर हंस रहा था। अनेक राज्य इस बात को जानने के लिए राजी नहीं थे कि उनके यहां कितने केस आ रहे हैं। जब उनके यहां केसों का आंकड़ा ही कम था तो केंद्र उन्हें ऑक्सीजन का ज्यादा एलोकेशन कैसे करता? हमारे एक पड़ोसी राज्य में 6 हजार केस प्रतिदिन थे, जबकि हमारे यहां 60 हजार केस प्रतिदिन। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि यदि वे सही टेस्टिंग करते तो उनके यहां भी 60 हजार केस ही होते।

अब बताइए केंद्र उनके लिए हमारे बराबर ऑक्सीजन कैसे तय करता? तो यदि किसी राज्य में एक हजार या दो हजार केस होंगे तो वहां के लिए ऑक्सीजन का कोटा भी कम होगा। यदि कोटा कम होगा तो लोगों को भारी समस्या होगी। क्योंकि उनके यहां कागज पर भले ही केस कम हों, लेकिन जमीन पर तो अफरातफरी मची है। हमारे मुख्यमंत्री ने पहले दिन से ही मुझसे कहा कि यदि मौतें हो रही हैं तो उनकी रिपोर्ट करने में बिल्कुल न हिचकिचाएं।
जारी.....

- लव कुमार सिंह

Saturday, 8 May 2021

कोरोना : समय और संख्या से बहुत कुछ बदल रहा है

Corona : Lot of Changes are seeing due to time and number


मास्क से मोहब्बत बनाए रखना....एक बार सुनें

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पिछले साल फरवरी में जब चीन में एक दिन में एक हजार मौतों की खबर आ रही थी तो कंप्यूटर पर उस खबर को पढ़ते हुए ही शरीर में झुरझुरी पैदा हो गई थी। फिर इटली में रोज सैकड़ों मौतों पर रोंगटे खड़े हुए थे। आज सहनशक्ति कहिए या संवेदनहीनता, हालत यह है कि अपने देश में 4000 से ज्यादा मौतों पर अत्यंत दुख तो हो रहा है, लेकिन फिर भी शरीर और दिमाग वैसी प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है, जैसी चीन या इटली की खबरें पढ़कर हुई थी। सब कुछ भावशून्य सा लग रहा है।

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पिछले साल मोहल्ले-मोहल्ले रस्सियों से बंधी बांसों की बल्लियां बहुत देखीं। इस बार संख्या इतनी ज्यादा है कि घर की दीवार से लगे पड़ोस में एक कोरोना मरीज का इलाज चल रहा है, लेकिन बांस-बल्लियां नदारद हैं। आसपास सन्नाटा है, मगर हड़कंप नहीं है।

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अभी तक कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट के बिना अस्पताल में भर्ती नहीं हो रही थी। अब ज्यादा संख्या के कारण रिपोर्ट में इतनी देर हो रही है कि आज ही नई गाइडलाइन आई है कि अब किसी की अस्पताल में भर्ती के लिए उसके पास कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट होना जरूरी नहीं हैं। हालत खराब लग रही है तो भर्ती करना होगा।

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बहुत दिनों से मन में विचार आ रहा था कि जब अधिकांश लोगों को कोरोना हो रहा है तो अब टेस्टिंग में समय, संसाधन और मैन पावर जाया करने से क्या लाभ? स्थानीय अखबारों में कई डॉक्टर भी सलाह दे रहे हैं कि क्यों नहीं जुकाम, बुखार, खांसी आदि लक्षणों वाले लोगों का इलाज कोरोना मानकर ही तुरंत शुरू कर दिया जाए? टेस्टिंग केवल वायरस की प्रकृति, म्यूटेंट आदि जानने के लिए ही हो या तब जब मरीज की स्थिति को लेकर असमंजस हो। पिछले साल तक इस विचार को लिखने में भी संकोच होता था, लेकिन जैसे-जैसे कोरोना अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है, उससे लगता है कि मोहल्लों की बांस-बल्लियों की तरह यह हमें टेस्टिंग रोक देने पर भी विवश कर सकता है। यानी जब सभी को है तो काहे की टेस्टिंग?

- लव कुमार सिंह