Saturday, 8 May 2021

कोरोना को हरा सकती हैं नई स्वदेशी दवाएं

New indigenous medicines can defeat Corona


कोरोना की इस आंधी में एक दवा की बहुत कमी है....एक बार जरूर सुनें...


2-डीजी

2-डीजी यानी डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज। इस दवा के जरिये टूटे दिल को जोड़ने वाली खबर दी है डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) ने। डीआरडीओ की इनमास लैब ने डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज के साथ मिलकर टू-डीजी नाम की कोरोना की दवा बना डाली है। यह दवा बहुत जल्द ( करीब तीन दिन में) कोरोना के मरीज को ठीक कर देती है। तीन फेज के क्लीनिकल ट्रायल में सफल होने के बाद इस दवा को मंजूरी मिल गई है। इससे पहले कि कयामत आ जाए, जल्दी से बाजार में आ जाओ टू-डीजी।


आयुष-64

आयुष-64 आयुष मंत्रालय की हर्बल दवा है जिसे कोरोना मरीजों के लिए रामबाण बताया जा रहा है। देशभर में 40 हजार लोगों पर इसका अध्ययन हुआ है और परिणाम बहुत सुखद हैं। किसी तरह का दुष्प्रभाव भी नहीं है। ज्यादातर मरीज छह से आठ दिन में निगेटिव हो गए। इस दवा को मंत्रालय ने सेंट्रल काउंसिल फार रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज के सहयोग से बनवाया है। हल्के और मध्यम श्रेणी के मरीजों में तो यह कारगर है ही, अति गंभीर मरीजों की हालत भी सुधारने में सफल रही है। अब आयुष मंत्रालय की तरफ से स्वास्थ्य मंत्रालय को इस दवा का प्रयोग करने के बारे में पत्र लिखा गया है।


कफासुरा कुडीनीर

सेंट्रल काउंसिल फार रिसर्च इन सिद्ध (सीसीआरएस) ने भी कोरोना के लिए एक दवा का व्यापक क्लीनिकल ट्रायल किया है, जो सफल रहा है। इस दवा का नाम कफासुरा कुडीनीर है। आयुष मंत्रालय ने कफासुरा कुडीनीर के इस्तेमाल के लिए भी स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र लिखा है।


वीराफिन

इससे पहले 23 अप्रैल को जाइडस कैडिला की 'वीराफिन' नाम की दवा को मंजूरी मिली थी। क्लीनिकल ट्रायल में वीराफिन ने शुरुआती लक्षण वाले मरीजों को ठीक करने में और गंभीर मरीजों की हालत को बिगड़ने से बचाने में बहुत बढ़िया भूमिका निभाई है। इस दवा को मंजूरी मिले 15 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। हो सकता है ये बाजार में आ भी गई हो या फिर आने वाली हो।
.....इन सबके नाम लिख लीजिए, बाजार में आते ही जरूरत के हिसाब से ले सकते हैं।

- लव कुमार सिंह
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कोरोना : समय और संख्या से बहुत कुछ बदल रहा है

Corona : Lot of Changes are seeing due to time and number


मास्क से मोहब्बत बनाए रखना....एक बार सुनें

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पिछले साल फरवरी में जब चीन में एक दिन में एक हजार मौतों की खबर आ रही थी तो कंप्यूटर पर उस खबर को पढ़ते हुए ही शरीर में झुरझुरी पैदा हो गई थी। फिर इटली में रोज सैकड़ों मौतों पर रोंगटे खड़े हुए थे। आज सहनशक्ति कहिए या संवेदनहीनता, हालत यह है कि अपने देश में 4000 से ज्यादा मौतों पर अत्यंत दुख तो हो रहा है, लेकिन फिर भी शरीर और दिमाग वैसी प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है, जैसी चीन या इटली की खबरें पढ़कर हुई थी। सब कुछ भावशून्य सा लग रहा है।

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पिछले साल मोहल्ले-मोहल्ले रस्सियों से बंधी बांसों की बल्लियां बहुत देखीं। इस बार संख्या इतनी ज्यादा है कि घर की दीवार से लगे पड़ोस में एक कोरोना मरीज का इलाज चल रहा है, लेकिन बांस-बल्लियां नदारद हैं। आसपास सन्नाटा है, मगर हड़कंप नहीं है।

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अभी तक कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट के बिना अस्पताल में भर्ती नहीं हो रही थी। अब ज्यादा संख्या के कारण रिपोर्ट में इतनी देर हो रही है कि आज ही नई गाइडलाइन आई है कि अब किसी की अस्पताल में भर्ती के लिए उसके पास कोरोना पॉजिटिव की रिपोर्ट होना जरूरी नहीं हैं। हालत खराब लग रही है तो भर्ती करना होगा।

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बहुत दिनों से मन में विचार आ रहा था कि जब अधिकांश लोगों को कोरोना हो रहा है तो अब टेस्टिंग में समय, संसाधन और मैन पावर जाया करने से क्या लाभ? स्थानीय अखबारों में कई डॉक्टर भी सलाह दे रहे हैं कि क्यों नहीं जुकाम, बुखार, खांसी आदि लक्षणों वाले लोगों का इलाज कोरोना मानकर ही तुरंत शुरू कर दिया जाए? टेस्टिंग केवल वायरस की प्रकृति, म्यूटेंट आदि जानने के लिए ही हो या तब जब मरीज की स्थिति को लेकर असमंजस हो। पिछले साल तक इस विचार को लिखने में भी संकोच होता था, लेकिन जैसे-जैसे कोरोना अपना दायरा बढ़ाता जा रहा है, उससे लगता है कि मोहल्लों की बांस-बल्लियों की तरह यह हमें टेस्टिंग रोक देने पर भी विवश कर सकता है। यानी जब सभी को है तो काहे की टेस्टिंग?

- लव कुमार सिंह

Thursday, 6 May 2021

हम कोरोना के खिलाफ क्यों हार रहे हैं?

Why are we losing against Corona?

How can we win against Corona?



हम कोरोना के खिलाफ क्यों हार रहे हैं?

1-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सात मई 2021 को फोन करके राज्य के हालात जानने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का ट्वीट......

“आज आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने फोन किया। उन्होंने सिर्फ अपने मन की बात की। बेहतर होता यदि वो काम की बात करते और काम की बात सुनते।”

2-
कांग्रेस आलाकमान, कांग्रेस शासित मुख्यमंत्रियों के साथ कोरोना पर बातचीत करता है यानी सिस्टम का हिस्सा बनता है, लेकिन 'सिस्टम' केवल मोदी को बताता है। कांग्रेस के पास मौका है कि राहुल गांधी के पास जितनी भी काबिलियत और आइडिया हैं, उनका कांग्रेस शासित या कांग्रेस की भागीदारी वाले राज्यों में इस्तेमाल करें और देश को दिखा दें कि वे बेहतर विकल्प हैं।

3-
इसके उलट होता यह है कि सोनिया गांधी काफी पहले वैक्सीन लगवा लेती हैं लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं करतीं कि कहीं केंद्र सरकार के विरोधी लोग वैक्सीन लगवाने को प्रोत्साहित न हो जाएं। ...और अब तो वैक्सीन-वैक्सीन का शोर मच ही रहा है।


हम कोरोना के खिलाफ कैसे जीत सकते हैं?


केरल को 73,38,806 वैक्सीन की डोज़ मिली थीं, जिनमें से उसने लोगों को 74,26,164 डोज़ दीं। यानी वहां 87,358 अतिरिक्त लोगों को वैक्सीन दी और वैक्सीन व्यर्थ नहीं गई। इस पर केरल के मुख्यमंत्री पी.विजयन का ट्वीट......

"केरल को भारत सरकार से 73,38,806 वैक्सीन की डोज़ मिलीं। हमनें 74,26,164 डोज़ उपलब्ध कराईं, हर शीशी से व्यर्थ जाने वाली डोज़ का इस्तेमाल करके हमने एक अतिरिक्त ख़ुराक बनाई। हमारे स्वास्थ्यकर्मी, ख़ासकर के नर्सें बेहद कुशल हैं और तहेदिल से प्रशंसा के लायक हैं।"

विजयन के ट्वीट पर प्रधानमंत्री का रिट्वीट.......

"हमारे स्वास्थ्यकर्मियों, नर्सों को देखकर ख़ुशी होती है कि वे वैक्सीन को व्यर्थ जाने से बचाने में एक उदाहरण पेश कर रहे हैं। कोविड-19 के ख़िलाफ़ मज़बूत लड़ाई के लिए वैक्सीन के नुक़सान को कम करना बेहद आवश्यक है।"

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....तो जैसे हमारे राजनीतिज्ञ अलग-अलग दिशा में रस्सी खींच रहे हैं, वैसे ही हम हैं। काफी लोग मदद में जुटे हैं तो बहुत सारे लूट-खसोट में। किसी ने अभी हाल ही में लिखा भी था कि "सरकारें हमारे सामने नंगी खड़ी हैं और हम सरकारों के सामने नंगे हैं और दोनों एक-दूसरे को देख रहे हैं।"

'यूनिटी इन डाइवर्सिटी' (विविधता में एकता) का भारत को दुनिया में सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है। लेकिन कोरोना काल ने हमारी इस विशेषता की पोल खोल दी है। हम यूनाइट कम हो रहे हैं और डाइवर्स ज्यादा। क्या करें...हम भारत वाले हैं, हमारे अंदाज निराले हैं....

एक बार ये भी सुनें....



- लव कुमार सिंह


#COVID19 #COVIDSecondWave #CovidVaccine #CovidIndia #CoronaPandemic #IndiaFightsCorona

Wednesday, 5 May 2021

कई मामलों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव से भी बढ़कर और भयंकर हैं पंचायत चुनाव

In many cases, Panchayat elections are more fierce than Lok Sabha and Vidhan Sabha elections



इस बार कई परिचित पत्रकार साथियों ने, पंचायत चुनाव में, प्रधान पद के लिए, अपनी उम्मीदवारी पेश की, मगर दुर्भाग्य से, विजयश्री किसी के हाथ नहीं लगी।

पत्रकारिता के क्षेत्र से अलग भी, कई युवा और होनहार परिचितों को, हार का सामना करना पड़ा है।

दरअसल...ज्यादातर गांवों में, जीत के फैक्टर, विधानसभा और लोकसभा चुनाव से भी बढ़कर और भयंकर हैं।

  • जबर्दस्त पैसा होना पहली शर्त है, जो हर चुनाव में होता ही है।
  • दावत के लिए हलवाई का इंतजाम 24 घंटे रखना है।
  • दारू इतनी खरीदें, कि वो नालियों में बहे और गांव के कुत्ते भी उसके आदी हो जाएं। मात्रा ज्यादा है तो दारू घटिया भी होती है, इसलिए ग्रामीणों की मौत पर जेल जाने को भी तैयार रहें।
  • कपड़े बांटिये, बर्तन बांटिये, गिफ्ट दीजिए और नकद पैसे भी बांटिए। एक बार नहीं कई बार बांटिए।
  • वोट चाहिए तो विकास का नहीं अपात्रों को कोटा, पट्टा, शौचालय और योजनाओं का लाभ दिलाने का वादा करना होगा।
  • सबसे ज्यादा नखरा चाचा, ताऊ और नजदीकी परिवारों का होता है। उन्हें मनाने के लिए तैयार रहें।
  • पहले से रंजिश है तो भुगतिए और नई रंजिश को गले लगाने के लिए तैयार रहिए।
  • जोड़तोड़ करने और खून-खराबे से बचने के लिए लाठी भी मजबूत होनी चाहिए।
  • हालांकि अपवाद तो हर चीज के, हर जगह होते ही हैं, इसलिए जो प्रत्याशी ये सब न करके जीते हैं, उन्हें मेरी तरफ से जीत की बहुत-बहुत बधाई।

अंत में बस इतना ही कि...

गांव में जो पैसों की बरसात हो रही है

दूध की नदियां बहें, ये आस हो रही है

पर बावला हूं मैं निरा, जिसे समझा जीवनधारा

दारू है वो, गले से गट-गट, पास हो रही है।

कई सारे मर्ज हैं, मेरे गांव में पसरे हुए

कभी खेत में, कभी कोर्ट में, बस राड़ हो रही है

सब कहे हैं, गांव वाले, सीधे-सादे भोले भाले

फिर इस कदर क्यों, रंजिशों की, ठाठ हो रही है?

- लव कुमार सिंह


Tuesday, 4 May 2021

कोरोना पर सवाल ही सवाल, पर जवाब नदारद

कोरोना पर सवाल ही सवाल, पर जवाब नदारद


Many Questions on Corona, but answers are missing



एम्स के निदेशक डॉ. गुलेरिया जनता से कह रहे हैं कि बेवजह सीटी स्कैन न कराएं। ये 100 एक्सरे कराने के बराबर है और इससे कैंसर का खतरा है। यह बात उन्हें खुद या सरकार के मार्फत देश के डॉक्टरों से कहनी चाहिए क्योंकि अधिकांश मामलों में डॉक्टरों के लिखने पर ही इस प्रकार के टेस्ट होते हैं।

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डा. गुलेरिया को वजनदार ढंग से डॉक्टरों से यह भी कहना चाहिए कि जब रामदेशवीर (रेमेडिसविर) में वीरों जैसी कोई बात नहीं है तो डॉक्टर इतनी महंगी दवाई क्यों लिख रहे हैं? कई ईमानदार डॉक्टर चीख-चीखकर कह रहे हैं कि डेक्सामेथासोन बहुत सस्ती भी है और रेमेडिसविर से ज्यादा कारगर भी, फिर इसे क्यों नहीं लिखा जा रहा है?

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क्या किसी विशेषज्ञ ने यह जानने की कोशिश की है कि दिल, किडनी और डायबिटीज के मरीजों को कोरोना ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है या उन्हें दी जाने वाली कोरोना संबंधी गोलियों का साइड इफेक्ट? क्योंकि ये तो सभी जानते हैं कि किसी निश्चित दवाई के अभाव में मरीजों पर तरह-तरह की दवाइयों का बस प्रयोग हो रहा है।

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ऑक्सीजन सिलेडंर के लिए लंबी लाइन में क्या ऐसी विनम्र कोशिश नहीं हो सकती जिससे यह पता लग सके कि सिलेंडर के लिए जो लाइन में लगा है, उसे वास्तव में उसकी जरूरत है या वह स्टोर करने के मकसद से इसे ले जा रहा है?

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पिछले साल मरीज कोरोना से मर रहे थे, लेकिन इस बार हर मरीज ऑक्सीजन की कमी से मर रहा है। कहीं ये इलाज के तरीके का बचाव तो नहीं कि जो भी मर रहा है उसका ठीकरा ऑक्सीजन पर फूट रहा है।

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विशेषज्ञ बता रहे हैं कि भाप फेफड़े का सैनेटाइजर है और नमक डालकर गर्म पानी से गरारे करना भी कोरोना को बहुत कमजोर कर देता है। लेकिन क्या अस्पतालों में मरीज भाप ले पा रहे हैं? क्या वे गरारे कर पा रहे हैं? मुझे तो नहीं लगता कि यह हो पा रहा है। उल्टे परिजनों द्वारा बाहर से भेजे गए गर्म पानी के उपकरण मरीजों तक पहुंचने के बजाय बीच में ही गायब हो जाते हैं।

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इस अल्पबुद्धि मन में प्रश्न ही प्रश्न हैं, लेकिन उत्तर नदारद हैं। ....और ये प्रश्न जाएं भाड़ में, बस इतना हो जाए कि भले सबको कोरोना हो जाए, लेकिन कोई मरने न पाए। ऐसा कब संभव होगा डॉक्टर साहब/सरकार? फिर प्रश्न?

- लव कुमार सिंह

Wednesday, 10 March 2021

महाशिवरात्रि : शिवलिंग गुप्तांग नहीं है, जानें शिवलिंग का वास्तविक अर्थ

Mahashivaratri : Shivling is not a genitals, know the true meaning of Shivling



आम लोग और हिंदू धर्म की आलोचना करने वाले लोग शिव लिंग को महज एक गुप्तांग या जननांग ही समझते हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार इसका वास्तविक अर्थ यह नहीं है, बल्कि कुछ और है। आइए जानते हैं कि समातन धर्म के मर्मज्ञों के अनुसार शिवलिंग का वास्तविक अर्थ क्या है।

  • संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इसे देववाणी भी कहा जाता है। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिन्ह या प्रतीक होता है। इस हिसाब से शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक या शिव का चिह्न।
  • जब हम पुरुषलिंग या पुल्लिंग कहते हैं तो इसका अर्थ होता है- पुरुष का प्रतीक।
  • इसी प्रकार जब हम स्त्रीलिंग कहते हैं तो उसका अर्थ हुआ स्त्री का प्रतीक। नपुंसकलिंग का अर्थ होता है नपुंसक का प्रतीक।
  • जहां तक गुप्तांग या जननांग का प्रश्न है तो संस्कृत में पुरुष जननांग को शिश्न कहा जाता है।
  • अगर हम पुल्लिंग या पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष के लिंग यानी जननांग से लगाएंगे तो स्त्रीलिंग का अर्थ भी स्त्री का लिंग होना चाहिए, लेकिन क्या स्त्री का लिंग होता है? जी नहीं।
  • विद्वानों के अनुसार शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्मांड और निराकर परम पुरुष का प्रतीक होने से शिव के प्रतीक को शिवलिंग कहा गया है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है। वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनंत ब्रह्मांड का अक्स या धुरी ही शिवलिंग है।
  • शिवलिंग का अर्थ अनंत भी है यानी जिसका कोई अंत नहीं है और न ही उसकी कोई शुरुआत है।
  • हम जानते हैं कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। इसी कारण से शिवलिंग को लेकर लोग अपने-अपने अर्थ निकाल लेते हैं।
  • शिवलिंग के संदर्भ में लिंग शब्द का अर्थ चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। धरती उसकी पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में विलय होने के कारण इसे लिंग कहा जाता है।
  • विद्वानों के अनुसार शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है। जैसे प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, ऊर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग। ब्रह्मांड में दो ही चीजें हैं- ऊर्जा और पदार्थ। हमारा शरीर पदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है। इसी प्रकार शिव, पदार्थ और ऊर्जा का प्रतीक बनकर शिवलिंग कहलाते हैं।
  • ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा ऊर्जा शिवलिंग में निहित है। वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है।
  • शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादि एकल रूप माना जाता है। यह पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है। इसका अर्थ हुआ कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैं।
  • इसी प्रकार योनि शब्द का भी संस्कृत में अर्थ है- प्रादुर्भाव या प्रकटीकरण। जैसे- मनुष्ययोनि, पशुयोनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतु योनि। अर्थात योनि का अर्थ केवल स्त्री का जननांग ही नहीं है।
  • जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। सनातन धर्म में 84 लाख योनि बताई जाती है। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। विज्ञान भी इस बात स्वीकारता है कि कि इस धरती पर 84 लाख प्रकार के जीव मौजूद हैं।
  • संस्कृत में पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि कहलाता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग नहीं होता है।
  • इस तरह यह स्पष्ट है कि शिवलिंग में लिंग से तात्पर्य प्रतीक से है। शिवलिंग का अर्थ है पवित्रता का प्रतीक
  • शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादि एकल रूप माना जाता है। यह पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक भी है। इसका अर्थ हुआ कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों समान हैं।
  • इसी प्रकार योनि शब्द का भी संस्कृत में अर्थ है- प्रादुर्भाव या प्रकटीकरण। जैसे- मनुष्ययोनि, पशुयोनि, पेड़-पौधों की योनि, जीव-जंतु योनि। अर्थात योनि का अर्थ केवल स्त्री का जननांग ही नहीं है।
  • जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है। सनातन धर्म में 84 लाख योनि बताई जाती है। यानी 84 लाख प्रकार के जन्म हैं। विज्ञान भी इस बात स्वीकारता है कि कि इस धरती पर 84 लाख प्रकार के जीव मौजूद हैं।
  • संस्कृत में पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि कहलाता है। अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग नहीं होता है।
  • इस तरह यह स्पष्ट है कि शिवलिंग में लिंग से तात्पर्य प्रतीक से है. शिवलिंग का अर्थ है पवित्रता का प्रतीक।
  • विद्वानों के अनुसार दीपक की प्रतिमा बनाये जाने से शिवलिंग की शुरुआत हुई। बहुत से हठ योगी दीपशिखा पर ध्यान लगाते हैं। हवा में दीपक की ज्योति टिमटिमा जाती है और स्थिर ध्यान लगाने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए दीपक की प्रतिमा स्वरूप शिवलिंग का निर्माण किया गया। ऐसा इसलिए ताकि बिना किसी बाधा के एकाग्र होकर ध्यान लग सके।
प्रस्तुति- लव कुमार सिंह


Wednesday, 3 March 2021

मैं तो लुट गया भगवान, मेरी मदद करो श्रीमान....(यूपी पंचायत चुनाव 2021)

UP Panchayat Election 2021

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट बीते साल यानी 2020 में दीवाली के समय से ही शुरू हो गई थी। कई जगह तो इससे पहले भी भावी प्रत्याशी अपने चुनाव प्रचार में लग गए थे। तब से मार्च 2021 तक गांव वासियों की मौज आ रही थी। चुनाव लड़ने के इच्छुक प्रत्य़ाशियों ने जैसे अपनी तिजोरियों का मुंह खोल दिया था। अब मार्च में शासन-प्रशासन ने पंचायत चुनाव का आरक्षण तय किया है। इसके अनुसार अनेक सामान्य सीटें आरक्षित हो गई हैं और आरक्षित सीेटें सामान्य हो गई हैं। हजारों लोगों का चुनाव लड़ने का सपना अधूरा रह गया है। अब प्रधान या अन्य पदों पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों का बुरा हाल है। जरा सुनिए उनकी व्यथा....




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मैं तो लुट गया भगवान

मेरी मदद करो श्रीमान

मैंने खूब सजाई दुकान

फीके हो गए सब पकवान

मैं था भावी ग्राम प्रधान

पर अब नहीं कोई पहचान

जनरल सीट हुई आरक्षित

मिट गए मेरे सब अरमान।

मैं तो लुट गया भगवान

मेरी मदद करो श्रीमान।

.......

नौकरी छोड़ के बनवाया

गांव में नया मकान

कपड़े बांटे, बर्तन बांटे

दिया जरूरत का सामान

नदी बहा दी दारू की

रोज बनवाए पकवान

पर डूबी लुटिया जबसे आया

ये सरकारी फरमान।

मैं तो लुट गया भगवान

मेरी मदद करो श्रीमान।

.........

पैर पूजे उनके जिनसे

न थी कोई पहचान

की दामाद जैसी सेवा

चाहे लुच्चा या बेईमान

मुफ्त का माल था खूब उड़ाया

ना माने कोई अहसान

अब चुनाव रेस से बाहर हुआ

जब कर दिया सब कुर्बान।

मैं तो लुट गया भगवान

मेरी मदद करो श्रीमान।

000000

- लव कुमार सिंह