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Saturday, 18 December 2021

विराट ने 'धोनी टू कोहली' जैसे सुगम सफर की कल्पना की होगी, लेकिन बीसीसीआई ने 'कोहली टू रोहित' को पथरीला बना दिया

विराट ने 'धोनी टू कोहली' जैसे सुगम सफर की कल्पना की होगी, लेकिन बीसीसीआई ने 'कोहली टू रोहित' को पथरीला बना दिया


कप्तानी का सफर 'कोहली टू रोहित' पथरीला और पीड़ादायक हो गया

जबकि यह 'धोनी टू कोहली' की तरह समतल और सुगम हो सकता था। 

क्रिकेट के 'निरक्षर' कहे गये विनोद राय यह काम आसानी से कर गए

लेकिन क्रिकेट के पंडित सौरव गांगुली यह करने से चूक गए।

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संयुक्त अरब अमीरात में 2021 में हुए टी-20  विश्व कप से पहले भारत में हल्ला मचा कि यदि भारत यह विश्व कप नहीं जीतता है तो विराट कोहली को टी-20 टीम की कप्तानी से हटा दिया जाएगा। क्या मीडिया में यह हल्ला भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पदाधिकारियों द्वारा लीक की गई सूचनाओं के बिना मच सकता था?  बिल्कुल नहीं।

इस हल्ले का यह असर हुआ कि विराट कोहली ने टी-20 विश्व कप से पहले ही घोषणा कर दी कि वह इस विश्व कप के बाद टी-20 टीम की कप्तानी छोड़ देंगे। उस दौरान यानी सितंबर 2021 में मैंने लिखा था कि- "भारतीय क्रिकेट के कर्णधारों, क्रिकेट में सक्रिय विभिन्न लॉबी और मीडिया के अनेक धड़ों ने क्या टी-20 विश्व कप में अभी से भारतीय टीम की संभावनाएं 50 प्रतिशत कम नहीं कर दीं है?" 

हुआ भी ठीक ऐसा ही और भारतीय टीम विश्व कप जीतना तो दूर अंतिम चार में भी जगह नहीं बना सकी।

उस पोस्ट में मैंने यह भी लिखा था कि- "चिंता इस बात की भी है कि कोहली कोई शांत व्यक्ति नहीं हैं। यदि उन्हें ठीक से संभाला नहीं गया तो वे जल्दी ही टीम से ही विदा न ले लें। भगवान करें ऐसा कुछ ना हो।" 

आज तीन महीने बाद ही ऐसी आशंका उत्पन्न होने लगी है। आप मेरी वह पोस्ट नीचे दिये गये लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। 

https://stotybylavkumar.blogspot.com/2021/09/How-will-the-Indian-team-perform-in-the-T20-World-Cup.html


बहरहाल, वर्तमान विवाद पर आते हैं। कोहली ने जब टी-20 की कप्तानी छोड़ी तो शायद वह संभावित अपमान से बचना चाहते थे। वे चाहते होंगे कि विश्व कप के बाद ऐसा न लगे कि उन्हें हटाया गया है। वे शायद चाहते थे कि जिस प्रकार कप्तानी का स्थानांतरण धोनी से उनके पास तक बहुत सुगमता से और धीरे-धीरे हुआ, उसी प्रकार उनसे रोहित शर्मा तक कप्तानी का स्थानांतरण हो।

हमें याद रखना होगा कि धोनी से कोहली तक कप्तानी का स्थानांतरण बेहद शालीनता से हुआ। और यह उस समय में हुआ जब विनोद राय बीसीसीआई की कमान संभाल रहे थे, जिनके बारे में अब कहा जा रहा है कि उन्हें क्रिकेट का कुछ पता नहीं था।

कप्तानी के 'धोनी टू कोहली' स्थानांतरण में एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि धोनी की अक्षमता या असफलता की वजह से कप्तानी कोहली को मिली है। कोहली ने यह स्थानांतरण स्वयं देखा था इसलिए वह ऐसा ही 'कोहली टू रोहित' में चाहते होंगे। जब उन्होंने टी-20 की कप्तानी छोड़ी और उसे भारतीय क्रिकेट टीम के लिए अच्छा कदम बताया गया तो सभी को लगा कि कप्तानी का मामला 'धोनी टू कोहली' जैसी सुगमता की तरफ बढ़ रहा है।

लेकिन इसके तुरंत बाद लाल और सफेद गेंद का हल्ला मचा दिया गया। यह भी ध्यान में नहीं रखा गया कि कोहली वनडे के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं। बहुत जल्दबाजी करते हुए चयनकर्ताओं ने कोहली को वनडे की कप्तानी से हटा दिया। बस यहीं कोहली को झटका लग गया। उनकी 'धोनी टू कोहली' वाली कल्पना टूट गई। 'गरिमा से पद छोड़ने' की जगह 'अपमानजनक ढंग से हटाने का भाव' आ गया। अक्षमता, विफलता जैसे शब्द ऊपर आ गए।

कुल मिलाकर बीसीसीआई ने कप्तानी के 'कोहली टू रोहित' सफर को पथरीला बना दिया है। बीसीसीआई के पदाधिकारी वनडे की कप्तानी पर फैसला करने से पहले बड़े आराम से विराट कोहली के साथ बैठक कर सकते थे। उसमें उन्हें प्यार से समझा सकते थे कि टी-20 की कप्तानी आपने जिस भी परिस्थिति में छोड़ी लेकिन अब यह हकीकत है कि आप टी-20 में कप्तान नहीं हैं। आपने जो फैसला लिया, वह भारतीय क्रिकेट के हित में है और हम उसकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन हम चाहेंगे कि वनडे की कप्तानी भी रोहित शर्मा को दे दी जाए ताकि अगले टी-20 विश्व कप के साथ ही वन-डे विश्व कप की भी तैयारी पुख्ता तरीके से शुरू हो सके। 

हो सकता है कि विराट कोहली इस तरीके से बात करने पर सहमत हो जाते और ऐसी अप्रिय स्थिति पैदा नहीं होती। हो सकता है कि वह कहते कि मुझे एक वन-डे विश्व कप में कप्तानी का मौका और दिया जाए, उसके बाद मैं स्वयं कप्तानी छोड़ दूंगा। इस प्रस्ताव पर अधिकारी परिस्थिति अनुसार फैसला कर सकते थे। कुल मिलाकर ऐसा करने पर कप्तानी का स्थानांतरण सुगमता से हो सकता था।

बीसीसीआई के पास अभी भी यह करने का अवसर है। सबसे पहले तो बीसीसीआई के पदाधिकारियों को बेसिर-पैर की खबरों को मीडिया में प्लांट करने से बचना होगा। इसके बाद वे विराट कोहली के साथ बैठकर बात करें। उन्हें समझाया जाए कि अब चूंकि चयनकर्ता फैसला कर चुके हैं तो वनडे की कप्तानी को लेकर हम कोई विवाद नहीं चाहते। आप शांत मन से टेस्ट टीम की कप्तानी करें और टीम को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएं। साथ ही आप वन-डे और टी-20 में भी अपना बहूमूल्य योगदान दें। आप महान खिलाड़ी हैं। हमारे मन में आपके प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। जो भी गलतफहमियां हुईं, उन्हें भूलकर आगे बढ़ें। ऐसा करने पर ही इस आग पर पानी पड़ सकता है और भारतीय टीम इस आग की तपन से बच सकती है।

देखते हैं सौरव गांगुली और बीसीसीआई के पदाधिकारी क्या कदम उठाते हैं। गेंद तो अब उनके ही पाले में है।

- लव कुमार सिंह

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आप क्या सोचते हैं?

How will the controversy surrounding the captaincy of the Indian cricket team be resolved?

Will Virat Kohli bid farewell to the Indian team?

Will the Indian team win the Test series in South Africa after the captaincy dispute?

Tuesday, 14 September 2021

क्रिकेट में क्या होती है मांकडिंग?

क्रिकेट में क्या होती है मांकडिंग?



क्रिकेट में मांकडिंग क्या है? What is Mankading in Cricket?

गेंदबाजी छोर का बल्लेबाज अगर गेंदबाज के गेंद फेंकने से पहले क्रीज से बाहर निकल जाता है और उसके बाद गेंदबाज गेंद फेंकने के बजाय अपने छोर पर लगे स्टंप की गिल्लियां गिरा देता है तो बल्लेबाज आउट माना जाता है। आउट होने के इस तरीके को  'मांकडिंग' कहा जाता है।

मांकडिंग नाम किस क्रिकेटर के नाम पर रखा गया है? Mankading is named after which cricketer?

मांकडिंग नाम भारतीय खिलाड़ी वीनू मांकड़ के नाम पर रखा गया है।

मांकडिंग नाम वीनू मांकड़ के नाम पर क्यों रखा गया? Why Mankading was named after Vinoo Mankad?

वीनू मांकड़

ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि वीनू मांकड़ ने ही क्रिकेट इतिहास में पहली बार किसी बल्लेबाज को इस तरीके से आउट किया था। वीनू मांकड़ एक दिग्गज क्रिकेटर थे। वे एक आलराउंडर थे। वे सबसे तेज 1000 रन और 100 विकेट लेने वाले पहले पहले भारतीय क्रिकेटर थे। वे पहले ऐसे भारतीय क्रिकेटर थे जिन्होंने एक ही टेस्ट में शतक जड़ा और पांच विकेट भी लिये।

मांकडिंग को आउट होने की कौन सी श्रेणी में रखा जायेगा? In which category will Mankading be placed out?

मांकडिंग को रन आउट की श्रेणी में रखा जाता है।

मांकडिंग के बारे में और क्या नियम हैं? What are the other rules about Mankading?

मांकडिंग से आउट होने वाली गेंद को गिना नहीं जाता है यानी वह गेंद ओवर की छह गेंदों में काउंट नहीं होती है। हालांकि विकेट गिरा हुआ माना जाता है।

एक मैच में एक गेंदबाज की ओर से कितने बल्लेबाजों का मांकडिंग से आउट करने का रिकार्ड है? There is a record of how many batsmen got out from Mankading by a bowler in a match?

कैमरून की 16 साल की गेंदबाज मेवा डाउमा ने 13 सितंबर 2021 को युंगाडा की टीम के चार बल्लेबाजों को मांकडिंग के जरिये रन आउट किया। यह मैच आईसीसी महिला टी-20 विश्व कप का क्वालीफाइंग मैच था।

मांकडिंग को लेकर विवाद क्यों होते हैं? Why are there controversies regarding Mankading?

परंपरा यह है कि मांकडिंग तरीके से बल्लेबाज को आउट करने से पहले गेंदबाज को, नॉन स्ट्राइकर छोर पर खड़े बल्लेबाज को चेतावनी देनी चाहिये। ज्यादातर मामलों में गेंदबाज गेंद फेंकने से पहले ही बल्लेबाज के बाहर निकलने को नजरअंदाज भी कर देते हैं। इससे कुछ ऐसा माहौल बन गया है कि गेंदबाज को इस तरीके से बल्लेबाज को आउट करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जब गेंदबाज चेतावनी देता है और फिर इस तरीके से बल्लेबाज को आउट कर देता है तो अक्सर बल्लेबाज नाराज हो जाते हैं। उनकी गेंदबाज से बहस हो जाती है। इसीलिये मांकडिंग को लेकर विवाद हो जाता है। जैसा कि आईपीएल में रविचंद्रन अश्विन और अंग्रेज क्रिकेटर बटलर के बीच हो चुका है।

- लव कुमार सिंह

#Mankading, #Cricket, #Runout, #VinooMankad


Wednesday, 23 June 2021

कोहली एंड कंपनी को अपने घुटने और दिल खराब नहीं करने दूंगा

Won't let Kohli & Company ruin my knees and heart

देवियों और सज्जनों! हमारे 50 साला पड़ोसी के घुटने बोल गए हैं। वे अपने दिल से भी लाचार हो गए हैं। पता है इल्जाम किस पर आया है? पहले महेंद्र सिंह धोनी, अब विराट एंड कंपनी का नाम आया है। आपको भले ही इस पर हंसी आए, पर पड़ोसी इस इल्जाम पर पूरी तरह गंभीर हैं। चलिए कुछ विस्तार से बताते हैं कि असल में क्या तस्वीर है।

हमारे पड़ोसी कहते हैं क्रिकेटर खुद तो दौड़कर अल्ट्रा फिट रहते हैं मगर हमसे कहते हैं- सारा दिन बैठकर मैच देखो। फुटबालर मैसी भी नब्बे मिनट में छुट्टी दे देता है। साइना-सिंधु इससे भी कम समय लेती हैं। हिमा दास और दुती चंद तो दस-ग्यारह सेकेंड में ही बाय बोल जातीं हैं। लेकिन क्रिकेटर सारा दिन निचोड़ लेते हैं।

फिर टीवी के सामने सारा दिन क्यों बैठते हैं? हमने पूछा।

अजी बैठना पड़ता है इनके लिए। हम इनके जबरा फैन जो ठहरे।

लेकिन बैठने में भी हालात अजीब होते हैं। अब देखिए ना, एक अंतरराष्ट्रीय मैच में विराट की पारी लड़खड़ाई तो पड़ोसी बेचैन होकर बिस्तर पर उकड़ू बैठ गए। हम भी उस दिन पड़ोसी से मिलने गए थे और पास में एक कुर्सी पर बैठे थे। पड़ोसी के इस मुद्रा में आते ही संयोगवश विराट के बल्ले से तुरंत चार रन निकल गए। पड़ोसी बिस्तर पर अधलेटे हुए कि विराट फिर गेंदबाज के सामने लाचार दिखा। पड़ोसी फिर उकडू बैठे तो गेंद सीमारेखा के पार। चमत्कार से अभिभूत पड़ोसी इसके बाद उकड़ू मुद्रा में ही जम गए। विराट के बल्ले से रन पे रन निकलते चले गए।

विराट दौड़ते-दौड़ते 98 पर पहुंच गया, मगर इधर पड़ोसी का घुटना 98 साला बुजुर्ग सा जम गया। इसी के साथ पेट में गया खाया-पीया अपनी सीमारेखा पर आ गया। तभी विराट के शतक का शोर मचा। शोर सुनकर पड़ोसी की पत्नी तेजी से कमरे में आई। पहले टीवी पर विराट को देखा, फिर पति और मुझ पर नजर घुमाई। कोहली को देखकर उसने ताली बजाई। लेकिन पति को देखा तो जोर से चिल्लाई- अरे रुको...बिस्तर पर ही निपटोगे क्या?

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दस जुलाई दो हजार उन्नीस। वन डे क्रिकेट का विश्व कप। पड़ोसी उकड़ू बैठे, एक पैर पर खड़े हुए, लेकिन कुछ भी अच्छा नहीं हुआ। भारत विश्व कप से बाहर हो गया। पड़ोसी का दिल टूट गया। उनका आरोप है कि क्रिकेटर बहुत कष्ट पहुंचाते हैं। ये उम्मीदों के पहाड़ पर चढ़ाते हैं और फिर वहां से नीचे की राह दिखाते हैं। ये ऐसा एक बार नहीं कई बार दोहराते हैं। पड़ोसी की मांग है कि उन जैसे सारे दिन टीवी के सामने जमे रहने वाले क्रिकेट के दीवानों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मैच में भारत की हार पर मुआवजा दिया जाना चाहिए।

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भारत में 23 जून 2021 की रात। फिर वही कहानी दोहराई गई। न्यूजीलैंड के खिलाफ विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में कोहली एंड कंपनी ने फिर से अपने प्रशंसकों की वैसी ही हालत कर दी है कि बीसीसीआई से मुआवजा मांगने का मन करने लगा। गुस्सा विराट कोहली पर भी आया। बेशक विराट कोहली महान हैं, लेकिन बड़े मैचों में कहां है उनकी प्रतिबद्धता, उनका समर्पण, उनकी एकाग्रता? न्यूजीलैंड की पारी के दौरान एक समय महोदय स्लिप में नाचते हुए दिखे थे जबकि उस समय नाचने का कोई कारण नहीं था। विश्व कप 2015 के सेमीफाइनल में आपने निराश किया। चैंपियंस ट्राफी के फाइनल में आपने दुखी कर डाला, फिर विश्व कप 2019 के सेमीफाइनल में आपने रुला डाला। अब टेस्ट क्रिकेट चैंपियनशिप के बाद हमारा बुरा हाल है। हमें आपकी महानता पर कोई संदेह नहीं, पर बड़े मैचों में अपने प्रदर्शन के बारे में थोड़ा सोचिएगा जरूर।

खैर, किसी तरह अपने दिल को संभालने की कोशिश कर रहा हूं। साथ में यह भी सोचता हूं कि कहीं ये हमारे उकड़ू बैठने या एक पैर पर खड़े होने का दबाव तो नहीं जिसे कोहली एंड कंपनी सहन नहीं कर पाती। मैंने देखा है कि जो दिनभर मैच नहीं देखते, जिन्हें क्रिकेट का कीड़ा ज्यादा नहीं लगा होता, वे ज्यादा परेशान नहीं होते। वे मैच की निष्पक्ष समीक्षा कर रहे होते हैं। लेकिन जो नौकरी से छुट्टी लेकर या जरूरी काम छोड़ धूनी रमा लेते हैं, जो मैच के दौरान मेहमानों से नहीं मिलते, जो अपने जरूरी मिलन रद्द कर देते हैं, वे पड़ोसी की तरह किसी भी हार के बाद बौरा जाते हैं, खिलाड़ियों को कोसते हैं और अपनी हालत खराब कर लेते हैं।

ऐसे ही लोगों से प्रेरणा पाकर पत्रकार बाल की खाल निकालते हैं। ऐसे ही लोगों से घबराकर क्रिकेट बोर्ड कप्तान बदल देता है। ऐसे ही लोगों से घबराकर कई खिलाड़ी संन्यास ले लेते हैं। लेकिन जीत-हार अपने हिसाब से चलती रहती हैं। उन्हें इन चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता। जीत उसी का वरण करती है जो अच्छा खेलता है। जीत उसी को मिलती है जो हार नहीं मानता। जीत उसको भी मिलती है जो घमंड नहीं करता।

इस ज्ञान प्राप्ति के बाद अपन ने भी एक फैसला किया है। खेल प्रेमी बना रहूंगा, पर दिनभर समय जाया नहीं करूंगा। कोहली-रोहित को अपने घुटने और दिल खराब नहीं करने दूंगा। उन्हें कोसूंगा नहीं, गाली नहीं दूंगा, उन पर फटूंगा नहीं। न उन्हें प्रशंसा के पर्वत पर चढाऊंगा। न निराशा के समंदर में डुबोऊंगा। खेल को खेल ही रहना दूंगा। खिलाड़ियों को उन्मुक्त खेलने दूंगा।

- लव कुमार सिंह


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Sunday, 13 June 2021

सुरेश रैना ने भी आत्मकथा लिखी...जानें प्रमुख खिलाड़ियों की आत्मकथाओं के नाम

Suresh Raina also wrote autobiography... know the names of biographies of prominent players

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व दिग्गज बल्लेबाज सुरेश रैना ने भी अपनी आत्मकथा लिख डाली है। 14 जून 2021 को इस किताब को ऑनलाइन लांच किया गया है। इस किताब में उन्होंने अपने क्रिकेट जीवन के सफर से जुड़े तमाम पहलुओं के बारे में विस्तार से बताया है।

सुरेश रैना ने अपनी आत्मकथा का नाम 'बिलीव' रखा है। इसमें उनके गाजियाबाद से कानपुर, लखनऊ होते हुए टीम इंडिया और फिर आईपीएल के सफर के बारे में रोचक ढंग से बताया गया है। इसमें उनके यूपी के स्पोर्ट्स हॉस्टल में रहने के दौरान के पलों को खासतौर से शामिल किया गया है। सुरेश रैना का कहना है इस किताब को पढ़कर युवा खिलाड़ी काफी कुछ सीख सकते हैं और अपने सपनों को सच करने की दिशा में उचित कदम उठा सकते हैं।

सुरेश रैना से पहले कई अन्य खिलाड़ी भी अपनी आत्मकथाएं लिख चुके हैं। कुछ प्रमुख आत्मकथाओं का विवरण इस प्रकार है--

सौरव गांगुली की आत्मकथा- 'ए सेंचुरी इज नॉट इनफ' 

सौरव ने इस किताब को बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया को समर्पित किया है और लिखा है कि यदि डालमिया न होते तो सौरव आज इस मुकाम पर न होते। सौरव ने इसमें अपने पहले रूममेट और दिग्गज बल्लेबाज दिलीप वेंगसरकर के  साथ पहली कड़वी मुलाकात के साथ ही यह भी बताया है कि कैसे वेंगसरकर ने उन्हें कप्तान से पूछे बिना ड्रॉप कर दिया था। भारतीय टीम के पूर्व कोच ग्रेग चैपल के साथ विवाद का किस्सा तो इस किताब में है ही, सौरव के कैरियर में बाधा पहुंचाने वालों के बारे में भी खुलकर लिखा गया है। इसमें अजहरुद्दीन की कप्तानी पर भी सवाल हैं तो सचिन से लगाव के बावजूद उनकी कमियां भी बताई गई हैं। राहुल द्रविड़ द्वारा चैपल का साथ देने का जिक्र भी है। सौरव ने इसमें क्षेत्रवाद का भी जिक्र किया है और यह भी बताया है कि कैसे वे धोनी, सहवाग, हरभजन, जहीर जैसे खिलाड़ियों को चयनकर्ताओं से लड़कर टीम में लाए। सौरव ने इसमें यह भी खुलासा किया है कि 2007 के पहले टी-20 विश्व कप में वह खेलना चाहते थे लेकिन राहुल द्रविड़ ने उन्हें और सचिन को न खेलने के लिए मना लिया था।

शाहिद आफरीदी की आत्मकथा - 'गेम चेंजर'

2020 में आई यह किताब भारत में खासतौर से इसलिए चर्चा में आई क्योंकि आफरीदी ने इसमें गौतम गंभीर के बारे में तीखी टिप्पणियां की हैं। उन्होंने गंभीर के बारे में लिखा है कि गंभीर का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं है। आफरीदी ने इसमें अपनी उम्र को लेकर भी खुलासा किया। इसमें उन्होंने अपनी जन्मतिथि 1975 बताई है, जबकि आधिकारिक रिकार्ड में यह 1980 है। यानी पांच साल का फर्क।

वीवीएस लक्ष्मण की आत्मकथा- '281 एंड बियांड'

स्टाइलिश बल्लेबाज रहे वीवीएस लक्ष्मण ने इस किताब का शीर्षक ईडन गार्डंस में आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी 281 रनों की ऐतिहासिक पारी से जोड़कर रखा है। उनकी इस पारी ने उस यादगार श्रृंखला का रुख ही बदल दिया था। यह किताब 2018 में सामने आई थी। खेल पत्रकार आर.कौशिक इसके सह लेखक हैं। लक्ष्मण ने इस किताब में अपने जीवन के उतार-चढ़ावों के अलावा इस बात का भी जिक्र किया है कि कैसे कुछ  खिलाड़ी बहुत प्रतिभावान होते हुए भी अपनी सफलता को संभाल नहीं पाते हैं और उनका खेल करियर बहुत जल्द खत्म हो जाता है।

सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा- 'प्लेइंग इट माय वे'

सचिन की आत्मकथा 2014 में प्रकाशति हुई। 2015 में इसका हिंदी संस्करण 'मेरी आत्मकथा' के नाम से बाजार में आया। इस पुस्तक के सह लेखक बोरिया मजूमदार हैं। इस किताब में सचिन के शुरुआती दिनों, उनके 24 साल के अंतरर्राष्ट्रीय करियर और जीवन के बारे में उनके उस दृष्टिकोण को सामने लाया गया है जो जिसे अभी तक लोग नहीं जानते थे। सचिन की यह किताब बहुत चर्चित रही और बेस्ट सेलर भी साबित हुई। इसने भारत में बिक्री के कई रिकार्ड भी तोड़ दिए थे। इस किताब ने लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड्स की कथा और गैर कथा श्रेणी में सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक का रिकार्ड बनाया था।

इस किताब में सचिन ने इस बात का भी सनसनीखेज खुलासा किया है कि 2007 के विश्व कप से कुछ माह पहले भारतीय टीम के तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल, सचिन के घर आए और सुझाव दिया कि उन्हें राहुल द्रविड़ से कप्तानी संभालनी चाहिए, जो उस समय टीम के कप्तान थे। हालांकि चैपल ने सचिन की इस बात का खंडन किया है। 

इस किताब में कपिल देव पर भी कड़ी और आलोचनात्मक टिप्पणियां की गई हैं। उल्लेखनीय है कि कपिल तब भारतीय टीम के कोच बने थे जब सचिन टीम के कप्तान बने थे और कप्तान के रूप में सफल नहीं रहे थे।

राहुल द्रविड़- 'द नाइस गाय हू फिनिश्ड फर्स्ट'

अपनी टिकाऊ बल्लेबाजी के कारण भारतीय क्रिकेट टीम में 'द वाल' (दीवार) के नाम से जाने गए राहुल द्रविड़ की एक जीवनी 2005 में प्रकाशित हुई जिसका नाम 'द नाइस गाय हू फिनिश्ड फर्स्ट' है। इसे देवेंद्र प्रभुदेसाई ने लिखा है।


अन्य खिलाड़ियों की आत्मकथाएं

  • मेजर ध्यानचंद की आत्मकथा- 'गोल'
  • हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी बलबीर सिंह की आत्मकथा- 'गोल्डन हैट्रिक'
  • कपिल देव की आत्मकथा- 'बाई गॉड्स डिक्री'। कपिल ने दो पुस्तकें और लिखीं- 'क्रिकेट माइ स्टाइल' और 'स्ट्रेट फ्राम द हार्ट'
  • रिकी पोंटिंग की आत्मकथा- 'पोंटिंग-एट द क्लोज ऑफ प्ले'
  • शोएब अख्तर की आत्मकथा- 'कंट्रोवर्शियली योर्स'
  • एडम गिलक्रिस्ट की आत्मकथा- 'ट्रू कलर्स'
  • सुनील गावस्कर की आत्मकथा- 'सनीज डेज' (इसके अलावा उन्होंने तीन आत्मकथात्मक पुस्तकें और लिखी हैं। ये हैं- 'आइडल', 'रन एंड रुइंस' और 'वन डे वंडर्स'। 
  • प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी डेविड बेकहम की आत्मकथा- 'माई साइड'
  • पीटी उषा की आत्मकथा- 'गोल्डन गर्ल'
  • विश्वनाथन आनंद की पुस्तक- 'माई बेस्ट गेम आफ चेस'
  • डॉन ब्रेडमैन की आत्मकथा- 'फेयरवेल टु क्रिकेट'
  • टाइगर वुड्स की पुस्तक- 'हाउ आई प्ले गोल्फ'
  • पेले की आत्मकथा- 'पेले'
  • टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा की आत्मकथा- 'अनस्टॉपेबल- माई लाइफ सो फार'
- लव कुमार सिंह

Sunday, 23 May 2021

क्रिकेट में क्या होती है 'ड्रॉप इन' पिच?

What is 'drop in' pitch in cricket?



आस्ट्रेलिया के पर्थ शहर में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच दूसरे टेस्ट मैच (2019-20) के दौरान एक नया शब्द 'ड्रॉप इन' पिच सुनने को मिला। पर्थ में अभी तक जिस मैदान पर टेस्ट मैच होते थे, उसे वाका के नाम से जाना जाता था। लेकिन अब पर्थ में वाका के साथ ही एक नया स्टेडियम 'ऑप्टस' बनाया गया है और इसमें क्रिकेट मैच के आयोजन के दौरान 'ड्रॉप इन' पिच का इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल 'ऑप्टस' स्टेडियम कई खेलों का स्टेडियम है। यहां केवल क्रिकेट ही नहीं खेला जाता बल्कि फुटबाल समेत तमाम खेल खेले जाते हैं। जाहिर है कि जब इस मैदान पर फुटबाल का खेल खेला जाएगा तो क्रिकेट की पिच के खराब होने की पूरी संभावना रहेगी। इसीलिए इस मैदान पर क्रिकेट मैच के दौरान 'ड्रॉप इन' पिच का तरीका अपनाया गया है।

'ड्रॉप इन' पिच को किसी दूसरी जगह पर तैयार किया जाता है। जब भी स्टेडियम में क्रिकेट मैच का आयोजन होता है तो उससे ठीक पहले ऐसी पिच को स्टेडियम में स्थापित कर दिया जाता है। जब स्टेडियम में क्रिकेट से अलग कोई और खेल होता है तो इस पिच को वहां से हटा दिया जाता है।

पर्थ के दूसरे टेस्ट मैच को टेलीविजन पर देख रहे दर्शकों को भी स्पष्ट रूप से पिच का वह हिस्सा बाकी मैदान से कुछ अलग रंग का दिखाई दिया। पिच के उस चौकोर हिस्से की घास का रंग अलग होने से कई बार तो ऐसा एहसास भी हुआ जैसे कि मैदान पर केवल पिच वाले स्थान पर ही सूरज की रोशनी पड़ रही हो। खासकर दोपहर के बाद यह नजारा विशेष रूप से दिखाई दिया।

'ड्रॉप इन' पिच का मुख्य लाभ यही है कि इसकी वजह से एक ही मैदान पर कई प्रकार के खेल और कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। अभी तक विशेष रूप से क्रिकेट के लिए बने स्टेडियमों में क्रिकेट के अतिरिक्त अन्य कोई गतिविधि नहीं हो सकती थी, लेकिन जहां 'ड्रॉप इन' पिच की सुविधा है, वहां क्रिकेट के अलावा फुटबाल, रग्बी जैसे खेल और म्यूजिकल नाइट जैसे आयोजन भी कराए जा सकते हैं।

'ड्रॉप इन' पिच का यह फायदा भी है कि इसे क्यूरेटर अपने मनमाफिक यानी अपने देश और अपनी टीम के अनुकूल बना सकता है। पहली 'ड्रॉप इन' पिच पर्थ के ही वाका स्टेडियम में स्थापित की गई थी।

- लव कुमार सिंह