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Friday, 29 May 2020

अखबार अनेक मगर गलतियां एक

Many Newspaper but mistakes one


  • हिन्दी अखबारों में रोजाना दिखाई देती हैं अनेक और एक जैसी गलतियां
  • इस प्रकार की गलतियां अखबारों में दशकों से ऐसे ही होती चली आ रही हैं 




आज हम कोई भी हिन्दी अखबार उठाकर देखते हैं तो उन सभी में खबर लिखने के तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए पत्रकार बंधु एक जैसी गलतियां करते नजर आते हैं। कोई अखबार इससे अछूता नहीं है और वर्षों से ये गलतियां बदस्तूर जारी हैं। कई चीजों और खबरों को लेकर अखबारों में बाकायदा नियम हैं, लेकिन फिर भी इनका पालन होता नहीं दिखाई देता। 

कई जगह संपादक इन पर नियंत्रण की कोशिश करते दिखाई देते हैं, लेकिन लगातार प्रयास के अभाव, पत्रकारों की एक से दूसरे संस्थान में लगातार आवाजाही, सब चलता है”  की मानसिकता और इस संबंध में किसी किस्म के शोध, विश्लेषण, एकरूपता आदि के अभाव में गलतियों में पूरी तरह सुधार नहीं हो पाता।

दरअसल किसी भी अखबार के संपादक या प्रबंधक समस्या की जड़ में नहीं जाते। वे कभी भी रिपोर्टिंग वाले सिरे को नहीं पकड़ते। बस डेस्क बनाकर जिम्मेदारी दे दी जाती है कि डेस्क खबर को संपादित और ठीक करें। रिपोर्टर को बहुत कम बताया जाता है कि गलतियां कहां हो रही हैं। सुबह अखबार में गलती मिलने पर डेस्क के पत्रकार को ही पकड़ा जाता है। अनेक बार रिपोर्टर को पता ही नहीं लग पाता कि उसने क्या गलती की है। यहां रिपोर्टर से तात्पर्य उन संवाददाताओं से है जो ब्यूरो ऑफिस से खबरें भेजते हैं। कई बार मुख्यालय पर तैनात रिपोर्टर भी खूब गलतियां करते हैं।

संपादक जब-तब ब्यूरो में जाकर बैठक लेते हैं। इन बैठकों में अखबार के प्रसार समेत अन्य अनेक मुद्दों पर चर्चा होती है पर लेखनी के बारे में बहुत कम चर्चा होती है। इसी का नतीजा यह है कि हिन्दी अखबारों में वही गलतियां बार-बार दिखाई देती हैं, जो दशकों से होती चली आ रही हैं। रिपोर्टर गलतियां करते रहते हैं और डेस्क के पत्रकार (अगर काबिल हैं तो) उन्हें सही करते रहते हैं। यदि किसी अखबार में डेस्क पर भी काबिल व्यक्ति नहीं बैठे हैं तो गलतियां यूं ही चली जाती हैं।

यहां ऐसी ही कुछ गलतियों की तरफ ध्यान दिलाना चाहूंगा जो पत्रकारों से अक्सर और अनजाने में हो रही हैं। छोटा, बड़ा हर पत्रकार इस तरह की महत्वपूर्ण गलतियां या चूक कर जाता हैं। इन गलतियों से खबर तो हास्यापस्द हो ही जाती है, कई बार वह अपना अर्थ भी खो देती हैं।

'बताया' और 'कहा' में अंतर नहीं करते


इस वाक्य पर गौर करिए- याकूब कुरैशी ने अखबार से बातचीत में बताया कि अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन है। 
अक्सर पत्रकार खबर लिखते वक्त 'बताया' और 'कहा' में भेद भूल जाते हैं। 'बताया' शब्द का इस्तेमाल तब होता है जब वक्ता कोई जानकारी देता है। जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता ने बताया कि उनकी पार्टी के संगठनात्मक चुनाव दिसंबर में होंगे। अमूमन पहले से प्रचारित या अस्तित्व में आ गई बात के लिए 'बताया' शब्द नहीं आएगा। अमेरिका मुसलमानों का दुश्मन है, ये किसी की निजी राय है। ये कोई जानकारी नहीं है। इसलिए यहां 'बताया' के स्थान पर 'कहा' शब्द का प्रयोग होना चाहिए था।

मृतक को जिंदा कर देते हैं


कुछ पंक्तियां देखिए- बदमाशों ने अंधाधुंध फायरिंग की जिससे कैलाश की मौके पर ही मौत हो गई। मृतक के परिजनों ने बताया कि मृतक घटना से कुछ ही देर पहले बाजार से बेटी की शादी के लिए खरीदारी करके आया था। बदमाशों को देखकर मृतक ने भागने की भी कोशिश की, लेकिन विफल रहा।
अक्सर पत्रकार खबर में लिखते हैं कि मृतक ये कर रहा था या मृतक ने ऐसा किया। आखिर मरा हुआ व्यक्ति कैसे कुछ कर सकता है? भूतकाल की घटनाओं के वर्णन में मृतक शब्द का इस्तेमाल बिल्कुल गलत है। यहां हम मृतक का नाम ही इस्तेमाल करें। जैसे- कैलाश के परिजनों ने बताया कि वह घटना से कुछ ही देर पहले बाजार से बेटी की शादी के लिए खरीदारी करके आया था।

पूरा होने से पहले ही वाक्य खत्म


यह वाक्य देखिए- रामदीन बहुत तेज दौड़ा। जबकि वह बुखार में तप रहा था।
अनेक पत्रकार ऐसे वाक्य लिखते हैं जिनके पूरा होने से पहले ही उनमें पूर्ण विराम आ जाता है। यहां वाक्य 'तप रहा था' पर खत्म हुआ लेकिन 'जबकि' से पहले भी पूर्ण विराम लगा दिया गया। 'जबकि', 'जो', 'लेकिन', 'जिनका' जैसे वाक्यों को जोड़ने वाले शब्दों से पहले कभी भी पूर्ण विराम नहीं होना चाहिए। इनसे पहले कॉमा यानी अर्द्धविराम का इस्तेमाल करिए या फिर कुछ भी मत लगाइए। रामदीन बहुत तेज दौड़ा, जबकि वह बुखार से तप रहा था या फिर रामदीन बहुत तेज दौड़ा जबकि वह बुखार से तप रहा था।

'ने', 'के''का''से' करते हैं परेशान


वाक्यों को जोड़ने वाले ये अक्षर बहुत महत्वपूर्ण हैं, जिनका इंट्रो लिखते वक्त गलत इस्तेमाल करने से अक्सर वाक्य गड़बड़ा जाते हैं। ये वाक्य देखिए- कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि ने संस्था के पूर्व सदस्यों को सम्मानित भी किया गया। 
अक्सर पत्रकार लंबे वाक्य में 'ने' अक्षर के पूरक शब्द 'किया' 'दिया' आदि का ध्यान नहीं रख पाते और 'गया' शब्द अतिरिक्त लगा देते हैं। ऐसा ही 'के', 'का' और 'से' के इस्तेमाल में होता है। इसीलिए कोई वाक्य लिखते समय उसके शुरू और अंत में ये जरूर देखना चाहिए कि  'ने', 'के', 'से' आदि का बाकी शब्दों से तारतम्य सही बैठ रहा है या नहीं।

आयोजन आज है या कल पता ही नहीं चलता


जब भी किसी खबर में तारीख या दिन का उल्लेख होता है तो कई पत्रकार गलती कर जाते हैं। उदाहरण के रूप में शनिवार 19 जनवरी की शाम को एक पत्रकार खबर लिख रहा है। खबर में ये जानकारी दी जानी है कि कोई क्रिकेट प्रतियोगिता सोमवार 21 जनवरी से शुरू होगी। अक्सर पत्रकार लिख जाता हैं- आयोजक ने आज प्रेस कान्फ्रेंस में जानकारी दी कि क्रिकेट प्रतियोगिता कल से शुरू होगी। 
अखबार चूंकि अगले दिन यानी रविवार सुबह को पाठक के पास पहुंचता है,  इसलिए इसे पढ़कर भ्रम हो जाता है कि प्रतियोगिता रविवार से शुरू होगी या सोमवार से। बेहतर यही है कि हम खबर में आज या कल के बजाए दिन और तारीख का इस्तेमाल करें। जैसे- आयोजक ने शनिवार को प्रेस कान्फ्रेंस में जानकारी दी कि क्रिकेट प्रतियोगिता सोमवार 21 जनवरी से शुरू हो रही है। शीर्षक यानी हैडिंग को हम उस दिन के हिसाब से लगाते हैं जिस दिन अखबार पाठक के हाथ में जा रहा होता है। यानी अखबार रविवार सुबह पहुंचेगा तो हम खबर के शीर्षक में सोमवार के लिए कल का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

मौत कभी संदिग्ध नहीं होती


अक्सर शीर्षक में लिख दिया जाता है- सुभाष नगर में श्रमिक की संदिग्ध मौत। 
वास्तव में मौत तो हो गई। उसमें तो कोई संदेह है ही नहीं। संदिग्ध तो हालात, स्थितियां, परिस्थितियां होती हैं। इसलिए संदिग्ध मौत के बजाय संदिग्ध हालात में मौत, संदिग्ध स्थितियों में मौत लिखा जाना चाहिए।

तत्वावधान का नहीं है विधान


कोई भी व्यक्ति बोलचाल में 'तत्वावधान' शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। फिर भी बहुतायत में खबरों के इंट्रो में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है, जबकि इससे आसानी से बचा जा सकता है। 'द्वारा' शब्द भी बोलचाल का नहीं है, पर कभी-कभी इससे बचा नहीं जा सकता, लेकिन तत्वावधान से आसानी से बचा जा सकता है। अक्सर लिखा जाता है- भजन संध्या का आयोजन श्रीराम संकीर्तन मंडल के तत्वावधान में किया जा रहा है। 
इसे बड़ी आसानी से हम यूं लिख सकते हैं- भजन संध्या श्रीराम संकीर्तन मंडल करा रहा है या भजन संध्या श्रीराम संकीर्तन मंडल की तरफ से हो रही है।

'इस अवसर पर' और 'उन्होंने कहा' से बहुत लगाव है


ये दो शब्द ऐसे हैं, जिनका किसी खबर में बार-बार और बेवजह इस्तेमाल होता है। बार-बार 'उन्होंने कहा' 'उन्होंने कहा' लिखकर हम यह बताना चाहते हैं कि यह बात फलाने व्यक्ति कह रहे हैं, लेकिन एक पैराग्राफ में सिर्फ एक बार 'उन्होंने कहा' लिखने से ये तो नहीं हो जाएगा कि उस बात को कोई और व्यक्ति कहने लगेगा। इसलिए एक पैरा में एक ही बार 'उन्होंने कहा' का इस्तेमाल करना चाहिए। 'इस अवसर पर' को भी एक ही बार इस्तेमाल करना चाहिए।

गलत किया तो महंगा तो पड़ेगा ही


अखबार में हम अनेक बार अनजाने में ही गलत शब्दों का इस्तेमाल करने लगते हैं। कई बार खबर के वजन के अनुसार शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। यानी खबर बहुत हल्की होती है और उसके लिए हम भारीभरकम शब्द प्रयोग करते हैं। या फिर खबर बहुत भारी होती है मगर हमारे शब्द हल्के रह जाते हैं।
दो शब्द हैं- महंगा पड़ना। इन्हें हम जाने-अनजाने खूब इस्तेमाल करते हैं। जैसे- मनचलों को महंगा पड़ा लड़की छेड़ना, चोरों को पुलिस लाइन में घुसना महंगा पड़ा। इस तरह नकारात्मक बातों में 'महंगा पड़ा' शब्द का प्रयोग गलत है। अगर कोई लड़की छेड़ने चला है यानी गलत काम करने चला है तो उसे तो यह काम महंगा पड़ना ही है। ये तो किसी क्रिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। कोई अच्छा काम करने चले और उसमें नुकसान उठाना पड़ जाए तब हम कहेंगे कि उसे यह महंगा पड़ा।

हमें किसी को पहाड़ पर नहीं चढ़ाना है


अखबारों में किसी अतिथि या मुख्य वक्ता के नाम का किसी खबर में जब दोबारा छोटे रूप में इस्तेमाल होता है तो 'श्री' या 'श्रीमती' शब्द का इस्तेमाल नहीं होता। जैसे 'श्री सिंह' या 'श्री यादव ने कहा' के बजाय 'यादव ने कहा' ही लिखा जाता है। इसके बावजूद कई पत्रकार ऐसा नहीं करते। वे बार-बार नाम से पहले श्री लगाते हैं।

बलात्कार पीडि़ता का नाम नहीं देना है


बलात्कार की खबर में पीडि़ता की पहचान नहीं दी जाती है। यानी न सिर्फ उसका नाम नहीं दिया जाता, बल्कि उसके परिजनों का नाम भी नहीं दिया जाता है। कई अखबार छेड़खानी जैसी खबरों में भी इस नियम का पालन करते हैं, लेकिन पर्याप्त निगरानी के अभाव में उनमें काम करने वाले पत्रकार इन नियमों का अक्सर उल्लंघन कर जाते हैं।

अधिकारी का काम है निरीक्षण करना


अखबारों में किसी अधिकारी के वक्तव्य से शीर्षक बनाने से परहेज बरतने का नियम है। इसीलिए अधिकारी का वक्तव्य या उसका नाम शीर्षक में तभी होना चाहिए जब वह कोई फैसला ले या ठोस कार्रवाई करे। खबर के अंदर भी अधिकारी या अतिथि के गुणगान से बचना चाहिए। भाषण में 'ये होना चाहिए' जैसी सतही चीजों को कम करके ठोस बातों और फैसलों पर फोकस करना चाहिए। ये सब लिखित, अलिखित नियम होने पर भी अनेक पत्रकार अधिकारियों के निरीक्षण पर हैडिंग लगाते हैं और उनका अनावश्यक भाषण छापते हैं। अरे भई, निरीक्षण करना तो अधिकारी का काम है। उसे तो वह करेगा ही।

आरोपी से भी पूछ लीजिए


'क' ने 'ख' पर कोई आरोप लगाया। हमने 'क' के सारे आरोप छाप दिए और 'ख' से उसका पक्ष पूछा ही नहीं। ऐसा सभी अखबारों के पत्रकार खूब कर रहे हैं। ऐसी खबरों से बचा जाना चाहिए। 'ख' की प्रतिक्रिया लिए बिना कुछ विशेष परिस्थितियों में तब खबर दी जा सकती है जब किसी अथॉरिटी (पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी या संस्था, सरकार) ने 'ख' के खिलाफ कोई कार्रवाई कर दी है। कार्रवाई नहीं हुई, 'ख' का पक्ष भी नहीं लिया जा सका और खबर महत्वपूर्ण भी है यानी उसे रोका नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में हम आरोपी यानी 'ख' की पहचान गुप्त रखकर खबर दे सकते हैं।

नामजद है तो क्या हुआ


राष्ट्रीय स्तर पर बड़े मामलों में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने पर आरोपी का नाम खूब छपता है। स्थानीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मामलों में ऐसा होता है। ऐसा इसलिए होता है कि बड़े मामले गंभीर और पुख्ता किस्म के होते हैं। इसके बनिस्पत हर छोटे-छोटे मामले में केवल नामजद रिपोर्ट होना ही आरोपी का नाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि स्थानीय स्तर पर लोग अनेक झूठे मुकदमे दर्ज कराते हैं और उनमें वे नाम भी लपेटते हैं जो मौके पर थे ही नहीं। इसीलिए सामान्य स्थितियों में गिरफ्तारी होने या हिरासत में लेने से पहले नामजद व्यक्ति का नाम नहीं देना चाहिए। इस नियम के बावजूद अखबारों में धड़ल्ले से रिपोर्ट में नामजद लोगों के नाम छपते हैं।

अरे भई, बाप की क्या गलती है


कोई किशोर या युवक किसी अपराध में पकड़ा गया तो पुलिस कार्यवाही में उसके पिता का नाम दर्ज होता है, लेकिन हमें खबर में नाहक अभियुक्त के पिता का नाम नहीं घसीटना चाहिए। पिता का उस अपराध में कोई दोष नहीं होता, इसलिए पिता का नाम नहीं देना चाहिए। हां, उसका पेशा दे सकते हैं। जैसे- नामी बिल्डर का बेटा चेन झपटते दबोचा गया। इस नियम का पालन भी अखबारों में होता दिखाई नहीं देता।

हंगामा, बवाल, सनसनी, हड़कंप, घेराव, हाहाकार का महत्व समझिए


इन भारी शब्दों को पत्रकार बंधुओं ने इतना हल्का बना दिया है कि हर खबर में इनका इस्तेमाल बहुतायत से होता है। किसी मोहल्ले में थोड़ी देर बिजली नहीं आई तो हाहाकार मच जाता है। यदि कयामत जैसी चीज आ जाएगी तो आप क्या मचाएंगे? फोटोग्राफर के कहने पर प्रदर्शन कर रहे कुछ लोगों ने हाथ उठाकर दो-चार नारे क्या लगा दिए, खबर में तुरंत 'हंगामा' हो जाता है। हर खबर सनसनी फैला देती है या फिर हड़कंप मचा देती है। फोटो में चार छुटभैये नेता अफसर के सामने बैठकर बात कर रहे होते हैं और खबर तथा फोटो परिचय बताता है कि अफसर का घेराव किया गया।

कुछ और नियम जिनका पालन होना चाहिए


  • किसी व्यक्ति की उम्र बताने के लिए पूरा वाक्य इस्तेमाल नहीं होता। उम्र कोष्ठक में (45) लिखी जानी चाहिए। 'वह 85 वर्ष के थे' जैसे पूरे वाक्य का इस्तेमाल विशिष्ट व्यक्तियों की उम्र बताने में ही किया जाता है।
  • इकाई यानी एक अंक की संख्या हमेशा शब्दों में लिखनी चाहिए। जैसे- एक, दो, पांच, नौ। इसके बाद की संख्याएं अंक में लिखें- जैसे 10, 11, 15 आदि।
  • शीर्षक में 'द्वारा' और 'व' शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही शब्द बोलचाल के दौरान इस्तेमाल नहीं होते। खबर में भी द्वारा से बचना चाहिए, हालांकि हर बार ऐसा हो नहीं पाता है।
  • कई गलतियां 'इ' और 'ई' की वजह से होती हैं। अंग्रेजी के जिन शब्दों के अंत में इ या उ की ध्वनि निकलती है, उनमें आम तौर पर उनके दीर्घ रूप का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे आई, माई, नाऊ, हाई। इसी तरह यदि इ अक्षर किसी शब्द के बीच में आता है तो ज्यादातर वह छोटी इ के रूप में ही लिखा जाता है। जैसे- ड्राइवर, साइकिल, लाइन आदि। लगभग सभी अखबारों में इस तरह के शब्दों को लेकर बहुत अराजकता की स्थिति है। एक ही अखबार में हमें 'ड्राईवर' भी देखने को मिलता है और 'ड्राइवर' भी। वर्तनी को लेकर तो खैर अखबारों में बिल्कुल भी एकरूपता नहीं है। 
  • अनेक शब्दों को (जैसे अमरीका, अमेरिका, नयी दिल्ली, नई दिल्ली, जायेगा, जाएगा, अंतरराष्ट्रीय, अंतरर्राष्ट्रीय आदि) हर अखबार अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल कर रहा है। इस पर अलग से विचार की जरूरत है। हिन्दी मीडिया में भाषा और वर्तनी को लेकर एकरूकता की सख्त जरूरत है।
- लव कुमार सिंह

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